पंचर वाले पापा की मेहनत ने बेटियों को बनाया डॉ. और फुटबॉलर

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यह कहानी है फरीदाबाद के रहने वाले फतेह सिंह रोपल की जो पंचर लगाने वाले पिता के नाम से मसहूर है। जो अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए पंचर लगाने का काम करता है। पालन-पोषण के साथ-साथ इस पिता ने सामाज की उस मिथ्य को भी तोड़ा जिसमे कहा जाता है कि बेटियों की शादी जल्दी कर दी जाए। क्योंकि यहां लड़कियों की जल्द शादी करने का रिवाज है। लेकिन इन्होंने अपने समाज के विपरीत जाकर अपनी बेटियों को घर की चौखट से बाहर निकालकर पढ़ने के लिए भेजा। खराब आर्थिक स्थिति के आगे भी इनके हौसले कमजोर नहीं हुए। बेटियों को अच्छी शिक्षा और मुकाम पर पहुंचाने के दिन-रात मेहनत के साथ लगे हैं।

अपनी इस मेहनत से इन्होंने झुग्गी से निकालकर एक बेटी को फुटबॉल का नेशनल प्लेयर बनाया तो दूसरी को डॉक्टर।
उनकी दुकान पर आने वाले लोगों को इस बात पर कई बार यकीन ही नहीं होता कि एक पंचर लगाने वाले के बच्चे डॉक्टर और नेशनल प्लेयर भी हो सकते हैं।

फतेह सिंह का बेटा व दोनों बेटी सरकारी स्कूल में पढ़ती थीं और दोनों पढ़ाई में अच्छी भी थीं। परंतु झुग्गियों में माहौल अच्छा नहीं था।
इसलिए फतेहसिंह ने अपनी बेटी की पढ़ाई के लिए झुग़्गी छोड़कर किराये पर कमरा लेकर रहने लगे। ताकि बच्चों की पढ़ाई में कोई दिक्कत ना आए। कोमल डाक्टर बनना चाहती थी। उसने अपने पिता से यह बात कही। तो पिता ने कहा क्यों नहीं, तुम पढ़ाई करो। बाकी की चिंता मुझ पर छोड़ दो।

कोमल ने बिना कोचिंग लिए 2014 में ऑल इंडिया प्री मेडिकल एंट्रेस टेस्ट में 498वीं रैंक प्राप्त किया। जिसके बाद बेटी के सपने को पूरा करने के लिए फतेह सिंह ने कर्जा लिया और बेटी को डाक्टरी की पढ़ाई के लिए हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) भेजा।

वहीं उनकी दूसरी बेटी बॉबी नेशनल फुटबॉल प्लेयर है। बॉबी खेल में लड़कों को भी मात देती है। बॉबी अक्सर पापा की दुकान पर आकर उनके काम में भी हाथ बंटाती है और वहां फुटबॉल की प्रैक्टिस भी करती है।
हाल ही में बॉबी नार्वे में हुए इंटरनेशनल टूर्नामेंट में हिस्सा लेकर लौटी है।

फतेह सिंह जैसे लोग ही समाज की उस मानसिकता पर प्रहार करते हैं जो बेटों और बेटियों में फर्क समझते है। फतेह सिंह और उनकी बेटियां समाज के लिए एक सबक है, सीख है।

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