ओबरी आली दादी की कहानी “जाय रोया जाड़ा”

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Sonia Satya Neeta

(पत्रकार/ कवयित्री)

Chandigarh, 14 Feb,2019

*****जाय रोया जाड़ा*****
रेडियो आली दादी के नाम से जाने जाने वाली दादी को “ओबरी आली” भी कह्या करते। बड़ा सी ओबरी, फिर आँगन, ठीक दोमंजली घर। उसके भाग्य की विडंबना देखिए ओबरी आली दादी के दस किल्ले थे, पर मालिक कोई नहीं। दादा गुजर गए थे, उसके ब्याह से केवल पांच साल बाद। याणी उम्र मे पिता की उम्र के आदमी के साथ ब्याह दी थी, ईब बीमारी के सत्तर टनटे।
किल्ले रह गए, ओबरी आली अपणे सास ससुर की देखभाल करती, खेती करती फिर कहती भी “किसे के पल्ले नहीं लागू”
यो छोड़ के चला गया, मेरे बाप ने एक के गल्ले लगाई, मैं क्यों और किसे का लत्ता ओढ़ ल्यु ?
सास, ससुर चल बसे अब ओबरी आली अकेली रह गयी। पड़ोस के जेठ से सलाह मशवरा किया कि “मेरे तो बालक नहीं” थाम किल्ले बो लो मेरे ते बस खाने के लिए दाने दे दियो।
दो साल किल्ले बोए, चार साल हो गये अब नई पीढ़ी के लिए ये किल्ले उनके थे, रजिस्ट्री करा ली और ओबरी आली के नाम से किल्ले उतरवा दिए। ओबरी आली को पता चला तो खूब दहाड़े मार रोई, पीहर का कोई नही जो संभाल करे।
छन्नो के पास रोती, किताबो के पास रोती, लच्छो को कहती सरपंच को बुला बता गलत करा मेरे गेल। पर बुढ़िया लुगाई सारी, सब कह देते “पा तो तेरे चेणीया म्ह पड़े सै” अर तू किल्ले लेवगी। टिक के टूक तोड़ ले नै।
ओबरी आली के पास रेडियो था, इसिलए चंद मिनट औरत, युवक उसके पास बैठकर रोटी का जुगाड़ कर दिया करते।
जाड़े थे, ओबरी आली अंधी हो चुकी थी। जिसको जो मिला उठा लिया रजाई, पलँग, चाकी, बर्तन, टोकनी सब ले गए बचा तो एक खाट, रजाई और रेडियो।
पूरी सर्दी कोसती रही वो “जाया रोया जाड़ा कोई बूट नही रे, कोई आग सुलगाने आला नही, कोई सकरात पे मनाने आला नहीं, ताता पाणी नही, रे कोई तो संभाल ल्यो मनै ।
पूरी जाड़े ओबरी आली जाड़े को और भगवान को कोसती रही पर किल्ले के साथ रोटी भी गयी। कोई बची हुई 4 रोटी दे जाता तो कल के लिए बचा लेती। चा का कप दिन मे मिल जाता तो खिल जाती वो। कोई बहु नहला देती, तो ठीक। अब तो बिचारि गंजी हो गयी थी कि कौन बाल सँवारे।
जाड़े के इन दिनों मे हर रात ओबरी आली रो के सोती। अंधेर के अलावा कुछ हो तो बोले वो। ईब बहु भी रेडियो लेकर चलती बनी की रोटी के बदले कुछ तो दे।
जाड़े को मर जाने जाड़े बोलती बोलती ओबरी आली दुनिया छोड़ चली गयी।

Sonia Satya Neeta

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