Home Breaking हरियाणा की रेतीली मिट्टी में सेब की खेती कर रहे हैं धर्मेंद्र किसान, कृषि वैज्ञानिक भी देखकर रह गए हैरान

हरियाणा की रेतीली मिट्टी में सेब की खेती कर रहे हैं धर्मेंद्र किसान, कृषि वैज्ञानिक भी देखकर रह गए हैरान

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Shweta Kushwaha, Yuva Haryana

Dadri, 25 Dec, 2018

सेब की खेती की बात होती है, तो हिमाचल या कश्मीर का ही ख्याल आता है क्योंकि ठंडे इलाके में ही खेब की फसल होती है। लेकिन दादरी में एक किसान ने रेतीली मिट्टी में ही सेब की खेती करने की सोची। अब सेब के पौधे खेतों में लहला रहे हैं और जल्द ही इनमें फल भी आने शुरू हो जाएंगे।

गांव कान्हड़ा निवासी धर्मेंद्र सिंह ने अपने खेत के डेढ़ एकड़ रकबे में सेब का बाग लगाया है। इससे पहले भी वह दर्जन भर पेड़ लगाकर सेबों का उत्पादन कर कृषि जगत के वरिष्ठ वैज्ञानिकों को हैरान कर चुके हैं, क्योंकि देश में सेब की खेती केवल बर्फीले सर्द क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में ही संभव है।

जब पहली बार किसान ने दर्जनभर सेब के खेत लगाकर कृषि वैज्ञानिकों को दिखाया, तो सभी ने गर्म लू को देखते हुए ऐसी खेती को नाकामयाब बताया था और उन्होंने इस पर बेवजह समय, पैसा और खेतीबाड़ी न करनी की सलाह दी थी। किसान धर्मेंद्र ने एक विशेष कीटनाशक का इस्तेमाल कर उन पेड़-पौधों का संरक्षण किया, तो आज वे फल देने लायक बन गए। जिसके बाद दोबारा पहुंची वैज्ञानिकों की टीम ने सेब के पेड़ों की मजबूत स्थिति को देखकर किसान की पीठ थपथपाई और उसके हौंसलों को बधाई भी दी।

बता दें कि पंजाब,हरियाणा, राजस्थान जैसे क्षेत्रों में किसानों व बागवानों ने अन्य फलों के पेड़ों को उगाना शुरू कर दिया, लेकिन सेब की खेती करनी की बात कहीं से भी सामने नहीं आई है।

किसान धर्मेंद्र का कहना है कि हरियाणा की रेतीली मिट्टी को कम आंकना सभी के लिए बुरी बात है क्योंकि 20 साल पहले हर तरह का फल, सब्जियां बाहर से मंगवाई जाती थी। लेकिन अब मौजूदा समय में संतरा, माल्टा, आंवला, नींबू, टमाटर जैसे सभी फल- सब्जी आज यहीं पर भारी मात्रा में उगाकर दूसरे शहरों में भेजे जा रहे हैं। आज का किसान किसी भी तरह के भय में आने की बजाय नवीनतम तकनीकी के इस्तेमाल से कृषि के साथ ही बागवानी से बड़ा मुनाफा कमा सकता है।

किसान ने बताया कि 10 साल पहले उन्नत किस्म के आंवले, माल्टा, नींबू की नई किस्मों का उत्पादन करके खेती की परंपरागत व्यवस्था में बदलाव किया। अब सेब के दर्जनभर पेड़ दो साल पहले बोए थे, जो आज इतिहास रचकर फल देंगे।

 

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