आजादी के मायने, उसके प्रतीक, राजनीति और हमारा भविष्य !

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@ अनिल भनवाला

#आजादी के मायने, उसके प्रतीक, राजनीति और हमारा भविष्य!
सभी साथियों को अंग्रेजों से उनके चहेतों को ” पावर ट्रांसफर दिवस” की जले दिल से शुभकामनाएँ।

गांधी सहित सभी कहते थे कि ये देश गांव और किसानों का देश है, लेकिन मोदी राज में इस परिभाषा को बदल जैन मूनियों और शंकराचार्य का करने का प्रयास किया जा रहा है। खैर मुझे नीतिगत मामलों में माऊंटबेटन, नेहरू और मोदी में कोई खास अंतर नजर नहीं आता। इन्हीं नीतियों पर गांधी ने नेहरू से कहा था,कि ” ये व्यवस्था 100 साल नहीं चलेगी, इस देश का किसान जागेगा और इस व्यवस्था को ध्वस्थ कर देगा। इस देश की तथाकथित आजादी की बूनियाद में भी बहुत गड़बड़ है, जो है वो नहीं है और नहीं है वो है।

1. पूरा विश्व हमें इंडिया के नाम से जानता है या हिन्दूस्तान के नाम से, लेकिन हमें “भारत माता” में उलझा रखा है। भारत बाहूबली के भाई भलाल देव से लिया गया है जो दक्षिणी पूर्वी एशिया के थाई प्रायःदीपों का नाम है। हमारा देश का भारत शब्द का क्या संबंध?

2. देश के झंडे को तिरंगा नाम दिया गया, जिसमें लाल रंग पंडों/कूर्बानी/त्याग का, सफेद रंग अंग्रेजों/शांति का, हरा रंग मुस्लिमों/किसान/ हरयाली का प्रतीक बताया गया है, लेकिन एक रंग और भी है वो “नीला” अशोक चक्र! जो मेरी नजर में तरक्की/दलित/भीम का प्रतीक कहा जा सकता है। झंडे जिसमें लगा हुआ है वो डंडा/लठ पहले कबिलाई प्रतिक था, जिसकी जगह अब लोहे की पाईप यानि पूंजीपतियों ने ले ली है।

* 1947 से लेकर आज तक इस देश की जनता पर राजनीति ही भारी रही है। राजनीति ने जनहित व देशहित के सभी मुद्दे गौण कर दिए है और राजनीति में सभी के सभी लोग अति महत्वाकांक्षी आए हैं। जिनका मकसद देश या जनता नहीं बल्कि स्वयं की तरक्की है। और उनकी ये भूख बहूत खाने के बाद भी शांत ही नहीं हो रही, बल्कि बढती ही जा रही है। आप किसी भी विधायक सांसद को देखें, शायद विरला ही आर्थिक कमजोर मिलेगा। 1947 के बाद इस देश के नेताओं जितनी तरक्की शायद ही किसी देश ने की हो!

दूसरी ओर किसान और किसान आधारित जनता की तरक्की उनती भी नहीं हुई है जितनी अन्य व्यापारिक सैक्टरों की हुई है। आज की राजनीति में किसानों की भागीदारी नग्नय है, वो लोग किसानों के झंडाबरदार बने बैठै हैं जिनका किसानी से दूर दूर तक कोई वास्ता ही नहीं है। सिर्फ वो राजनैतिक दलों में अपनी जातियों के प्रतिनिधि ना होकर पार्टी के प्रतिनिधि हैं, उस जाति में।

पहले नेता अपने भाषण से जनता की ओपियन चैंज करते थे, आज प्रधानमंत्री स्तर के नेता जनता की सोच/पसंद को देकर बोलता हैं।
यानि मेरी नजर में ये राजनीति और सरकार का निम्नतम स्तर है। जिसमें देश की जनता को सिर्फ विकास के नाम पर बरगलाया जा रहा है मुर्ख बनाया जा रह है। यहाँ तक की बिना युद्ध के सैनिकों को मरवाया जा रहा है और उन शहीदों की लाशों से भी वोटों की उम्मीद की जा रही है।
इस तरह की राजनीति और ये किसानों का शोषण ज्यादा दिन नहीं चलने वाला है।

जिस दिन जनता जान लेगी कि हमें मिली आजादी झूठी है, उस दिन कहर नेताओं और व्यापारियों पर पडेगा।
मेरी अपील देश के कर्णधारों से कि इस देश को बचाएं, सच्ची आजादी लाएं, ऐसे कानून बनाए जिससे देश में समानता आए, देश खुशहाल हो सब प्यार से रहें!
अनिल भनवाला

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