कांग्रेस ने CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का नोटिस राज्यसभा के सभापति को दिया, 60 सांसदों ने किए हस्ताक्षर

Breaking देश सरकार-प्रशासन हरियाणा

Gourav Sagwal, Yuva Haryana

Panchkula (20 April 2018)

कांग्रेस ने राज्यसभा के सभापति वेकैंया नायडू को  CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का नोटिस सौंपा दिया है। शुक्रवार को राज्यसभा में कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आज़ाद के नेतृत्व में सभी विपक्षी दलों की बैठक बुलाई गई थी। बैठक में तमाम दलों के नेताओं ने हिस्सा भी लिया और फैसला हुआ की सभी दल मिलकर CJI के खिलाफ राज्यसभा के सभापति को नोटिस देंगे। इस पर करीब 60 सांसदों ने अपने हस्ताक्षर किए जिसके बाद कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद ने राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू से उनके आवास पर मिलकर नोटिस सौंपा दिया है।

बता दें कि यह महाभियोग सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे जज लोया की मौत के मामले में जांच ना करने के लिए लाया गया। गुलाम नबी आजाद के कमरे  में हुई विपक्षी दलों की बैठक में जज लोया की मौत को लेकर दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट की ओर से खारिज किये जाने की चर्चा हुई। इसके बाद ही महाभियोग का नोटिस देने का निर्णय लिया गया।

CJI के खिलाफ महाभियोग के नोटिस पर 7 दलों के 60 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। नोटिस पर हस्ताक्षर करने वाले दलों में कांग्रेस, राकांपा, माकपा, भाकपा, सपा, बसपा और मुस्लिम लीग शामिल हैं। हालांकि, आरजेडी और टीएमसी अभी महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

 

क्या है महाभियोग?

महाभियोग वो प्रक्रिया है जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जजों को हटाने के लिए किया जाता है। इसका ज़िक्र संविधान के अनुच्छेद 61, 124 (4), (5), 217 और 218 में मिलता है।

महाभियोग प्रस्ताव सिर्फ़ तब लाया जा सकता है जब संविधान का उल्लंघन, दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित हो गए हों। नियमों के मुताबिक़, महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है।

CJI के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा में 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर की आवश्यकता होती है। हस्ताक्षर होने के बाद प्रस्ताव संसद के किसी एक सदन में पेश किया जाता है। यह प्रस्ताव राज्यसभा चेयरमैन या लोकसभा स्पीकर में से किसी एक को सौंपना पड़ता है।

जिसके बाद राज्यसभा चेयरमैन या लोकसभा स्पीकर पर निर्भर करता है कि वह प्रस्ताव को रद्द करे या स्वीकार करे। अगर राज्यसभा चेयरमैन या लोकसभा स्पीकर प्रस्ताव मंजूर कर लेते हैं तो आरोप की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया जाता है। इस कमेटी में एक सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश और एक न्यायविद् शामिल होता है।

इसके बाद अगर कमेटी जज को दोषी पाती है तो जिस सदन में प्रस्ताव दिया गया है, वहां इस रिपोर्ट को पेश किया जाता है। यह रिपोर्ट दूसरे सदन को भी भेजी जाती है।

जांच रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से समर्थन मिलने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए चीफ जस्टिस को हटाने का आदेश दे सकते हैं।

यह भी पढ़ें

हैक हुई सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट, ब्राजील के हैकर ग्रुप पर शक

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *