देसी दारू हो गई है भाजपा, फटाफट चढ़ती है, सटासट उतरती है

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लोग उलझन में हैं कि भाजपा के प्रति देश में माहौल क्या है, लोग मोदी और बीजेपी को पसंद कर रहे हैं या अब नापसंद करने लगे हैं। एक तरफ जहां यह पार्टी त्रिपुरा और उत्तरप्रदेश जैसे राज्य फतेह कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर उन तमाम जगहों पर उपचुनाव हार रही है जहां वो कुछ समय पहले तक काफी मजबूत थी।
ये दोनों ही पहलू तथ्यात्मक हैं और इसमें कोई संयोग नहीं है। दोनों सच पर आधारित हैं। और सच यह है कि जिन क्षेत्रों में भाजपा नहीं है, वहां पार्टी को जबरदस्त फायदा हो रहा है। खासकर हिन्दी भाषी राज्यों में बीजेपी आसानी से कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर रही है। उत्तरप्रदेश में क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी और त्रिपुरा में वाम दलों को भी भाजपा ने करारी शिकस्त देकर सत्ता से बाहर किया है।
लेकिन उसी उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री की लोकसभा सीट गोरखपुर पर पार्टी औंधे मुंह गिरी जहां वो 35 साल से नहीं हारी थी, और जिस लोकसभा सीट में सभी विधायक भाजपा के हैं।
लेकिन इससे आगे कुछ और सच हैं जिन पर ना मीडिया का ध्यान है, ना भाजपा जिन पर चर्चा करना चाहती। वो ये है कि जहां लोगों ने भाजपा को सत्ता दे रखी है, वहां चुनाव होने पर भाजपा को नुकसान हो रहा है। लगभग हर ऐसी जगह जहां बीजेपी सत्ता में थी, वहां पिछले सालों में हुए चुनावों में पार्टी का ग्राफ गिरा ही है।
मई 2014 में नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात और गोवा में भाजपा की सरकार होते हुए चुनाव हुए, गुजरात में पार्टी की सीटें 115 से घटकर 99 रह गई और गोवा में 21 से घटकर 13. हालांकि सरकार दोनों जगह फिर से भाजपा ने ही बनाई। पंजाब में भाजपा की सीटें 12 से घटकर 3 रह गई और उनका गठबंधन सत्ता से बाहर हो गया। बिहार में कुछ दिन पहले तक नितीश कुमार के साथ सत्ता में रही भाजपा को चुनाव होने पर काफी नुकसान हुआ और सीटें 91 से घटकर 53 रह गई। एकमात्र राज्य जहां बीजेपी सत्ता में थी और उसकी सीटें बढ़ी, वो है झारखंड। बीजेपी का गठबंधन वहां सत्ता में था और मुख्यमंत्री झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन थे।
यानी बीजेपी को सत्ता दे चुके लोग जल्द ही असंतुष्ट हो रहे हैं और केंद्र में पार्टी की सरकार होने के बावजूद बीजेपी को पहले से कम वोट दे रहे हैं। केंद्र या राज्य में सत्ता में होने का जहां किसी आमतौर पर किसी दल को फायदा मिलता है, वहीं बीजेपी के लिए यह नुकसान की बात साबित हो रही है।

प्रचंड बहुमत से साथ यूपी में सरकार बनाने के 6 महीने में मुख्यमंत्री के क्षेत्र में लोकसभा उपचुनाव हारना बीजेपी के लिए मुश्किल सवाल बना हुआ है।

एक विशेष पहलू ये भी है कि मई 2014 से अब तक 10 गैर हिन्दी ऐसे राज्यों में चुनाव हो चुके हैं जहां लोगों ने बीजेपी को एंट्री देने से साफ मना कर दिया है। आंध्रप्रदेश (239 में से 9), उड़ीसा (147 में से 10), सिक्किम (32 में से 0), तेलंगाना(119 में से 5), तमिलनाडु (234 में से 0), पश्चिम बंगाल (294 में से 6), केरल (140 में से 1), पांडुचेरी (36 में से 0), मेघालय (36 में से 0), मेघालय (70 में से 2), नागालैंड (60 में से 12) ऐसे राज्य हैं जहां बीजेपी महत्वपूर्ण दल नहीं बन पाई है। ये सभी राज्य क्षेत्रीय दलों के पास थे, और लोगों ने उन्हें ही सत्ता में रखा है। नागालैंड में बीजेपी सहयोगी दल के तौर पर सत्ता में हिस्सेदार हो गई है।

निचोड़ ये है कि कांग्रेस के मुकाबले लोग बीजेपी को बहुत पसंद कर रहे हैं, लेकिन जहां बीजेपी पहले से सत्ता में है, वहां लोग उनसे निराश हो रहे हैं। यानी मोदी युग में बीजेपी का नशा बहुत जल्दी सिर चढ़कर बोलता है, और बहुत जल्दी नशा उतर भी रहा है।

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