देवर-भाभी का प्यार बढ़ाती होली

कला-संस्कृति होली के रंग

देवर के संग होली खेलण का यो अलग नजारा हो सै

माँ के जाये भाईयां तै भी भाभी का देवर प्यारा हो सै

 

आपणे मन की बात बैठ के या  साझी गल्यां करलें है

देवर हो सै घणा लाडला या आपे कुची भरले है

छोटे छोटे बालकां की ढ़ालां या बात बात पे लड़ले है

कोये लांबा इनका केस चले ना यें आपे हामी भरले है

भाभी की मोह ममता ते लागे यो घणा दुलारा हो सै

                           देवर के संग ……………………

 

देवर ने या अाछी लागे जब मीठी बोल लुभावे है

उरे परे कोये दिखे ना तो  झोली दे कै बुलावे है

बोझा भारी बेसक ना हो  पर देवर तै उठवावे है

राह चलते या करे मसखरी तिरछे नयन लखावे है

पेट पाप इनके होंदा कोनी यू हो देशी घी का बारा हो

                          देवर के  संग ……………………..

 

सावण के म्हा ठाठ होंवें ये जब झुला झुलण ज़ावें है

रंग बिरंगे लते पहर के ऊँची झुल झुलणा चाहवें है

देवर देवे झोंटे ऊँचे और यें मिठे सुर में गीत  सुणावे है

काना के म्हां मिसरी सी लागे जब पायल ये खणकावें है

सासु का यें नाक तोड़ के दिखे देवर ने कहें बिचारा हो

                           देवर के संग ……………………..

 

घर कुणबे में रोनक छाज्या इसा प्यार किते यो पा ज्या तो

देवर का हो स्वर्ग सा  जीणा जे भाभी नेग निभा ज्या हो

मां अर भाभी में फर्क नहीं बस या बात समझ में अाज्या हो

अनुप कुमार यो हरदम चाहवे दिखे भाभी बैठी पाज्या हो

उनकी रहगी ईब याद एकली मेरा कोनी चाला चारा हो

                            देवर के संग ………………………

 

                        -डॉ अनूप कुमार शर्मा, जुलाना

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