चंडीगढ़ में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दुष्यंत चौटाला ने किया यह बड़ा खुलासा, पढ़िए-

Breaking चर्चा में बड़ी ख़बरें राजनीति शख्सियत हरियाणा हरियाणा विशेष

Shweta Kushwaha, Yuva Haryana

Chandigarh, 18 Feb, 2019

चंडीगढ़ में दुष्यंत चौटाला द्वारा एक प्रैसवार्ता का आयोजन किया गया, जिसमें दुष्यंत चौटाला ने गुरुग्राम में नेशनल हाइवे- 8 से सटी प्राइम लोकेशन की 13 एकड़ जमीन को गलत तरीके से बिल्डर्स को रास्ता दिए जाने की बात का खुलासा किया।

दुष्यंत ने बताया कि सेक्टर-16 (Behind 32 milestone) में एक निजी बिल्डर की जमीन है, जिसकी शुरूआती डिजाइन और प्लानिंग में रास्ता एक लोकल रोड से होते हुए था। बिल्डर की जमीन और नेशनल हाइवे के बीच हुडा की ग्रीन बेल्ट है। बिल्डर ने पहले ग्रीन बेल्ट के पास से होते हुए एक अन्य सड़क तक रास्ता मांगा, जो सड़क नेशनल हाइवे में मिलती है।

लेकिन राज्य सरकार ने कमाल की दरियादिली दिखाते हुए बिल्डर को ग्रीन बेल्ट के बीचों बीच सीधा रास्ता बनाकर दे दिया। बिल्डर की जमीन का नेशनल हाइवे के लिए जो रास्ता लगभग 2 किलोमीटर का था, वो घटकर 200 मीटर रह गया। और इस नए रास्ते का इस्तेमाल सिर्फ बिल्डर की जमीन पर जाने के लिए ही होगा, क्योंकि इसे जमीन पर ले जाकर खत्म कर दिया गया है।

उन्होंने बताया कि इसमें मुख्य रूप से दो गलत काम किए गए और दोनों की ही पुष्टि सरकारी रिकॉर्ड, आरटीआई और CAG-2017 की रिपोर्ट से होती है।

-पहला गलत काम ये कि सरकार ने नेशनल हाइवे अथॉरिटी से रास्ते की इजाज़त पब्लिक इंटरेस्ट के नाम पर खुद ली। HUDA के अधिकारियों ने खुद चिट्ठी लिखकर अपने लिए इजाज़त ली, ना कि बिल्डर के नाम से। NHAI से बिल्डर खुद इजाज़त लेता तो काफी मुश्किल काम था और शायद मिलती ही नहीं।

साथ ही नेशनल हाइवे अथॉरिटी के नियमों का भी पालन करना पड़ता। आरटीआई से मिली जानकारी में साफ लिखा है कि हरियाणा सरकार ने हुडा विभाग के Executive Engineer, Division -3, गुरुग्राम के जरिए यह इजाज़त हासिल की। यह सरकार के स्तर पर अनैतिक काम है और इससे बिल्डर की जमीन की कीमत कई गुणा बढ़ गई। जो प्रोजेक्ट लगभग 500 करोड़ का था, वो 1500 करोड़ का हो गया।

-दूसरा गलत काम यह किया गया कि बिल्डर की जमीन के लिए जो रास्ता दिया गया, उसकी जमीन के बदले बिल्डर से ना कोई जमीन ली गई, ना ही कोई कीमत ली गई। नियम के अनुसार जितनी जमीन रास्ते में दी गई, उससे डेढ़ गुणा जमीन बिल्डर से ली जानी चाहिए थी।

CAG -2017 की रिपोर्ट में पेज 106 पर यह साफ लिखा गया है कि जमीन के बदले जमीन ना लेकर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया। कुल 4930 वर्ग मीटर जमीन दी गई जिसके बदले लगभग 7500 वर्ग मीटर जमीन ली जानी चाहिए थी। जिस जगह यह प्रोजेक्ट है, वहां जमीन की मार्केट वैल्यू लगभग ढाई लाख रुपये वर्ग मीटर है। इस हिसाब से लगभग 160 करोड़ रुपये कीमत की जमीन बिल्डर से ली जानी चाहिए थी जो नहीं ली गई।

– कुल मिलाकर बिल्डर को लगभग 1000 करोड़ रुपये का फायदा इस प्रक्रिया में पहुंचाया गया। विशेष बात यह है कि प्रोजेक्ट की फाइल पर मंजूरी खुद मुख्यमंत्री ने साल 2015 में दी थी। बाकायदा दो जगह मुख्यमंत्री के नाम से फाइल को देखने करने और मंजूरी करने की नोटिंग है। और 2017 की CAG की रिपोर्ट में साफ लिखा गया कि सरकार ने जमीन के बदले जमीन ना लेकर घोटाला किया।

– खट्टर सरकार ने बिल्डरों को फायदा पहुंचाने का यह तरीका हुड्डा सरकार से सीखा है। हुड्डा सरकार में रॉबर्ड वाड्रा ने 5 करोड़ में जमीन खरीदी, सरकार ने उसका CLU किया और वाड्रा ने वो जमीन डीएलएफ को 55 करोड़ में बेच दी। यानी सरकार ने सुविधा देकर जमीन की कीमत दस गुणा बढ़ा दी। वैसे ही इस मामले में भी हाइवे से रास्ता मिल जाने के बाद जमीन को एक बड़े बिल्डर ने खरीद लिया है। इससे यह तय हो जाता है कि सरकार की मदद से जमीन की हाइवे से रास्ते की सुविधा दिलवा दी गई और फिर उसे बड़े बिल्डर को बेच दिया गया।

– निजी बिल्डर ने नया रास्ता बनाने के लिए तोड़े गए स्टाफ क्वार्टर्स और वाटर ट्रीटमेंट प्लांट को दूसरी जगह बनाए जाने पर हुए खर्च के पैसे सरकार को जमा करवाए। इससे यह स्थापित होता है कि रास्ता बिल्डर के फायदे के लिए बनाया गया। बस गलत यह रहा कि एक तो सरकारी जमीन के बदले बिल्डर से जमीन या हर्जाना नहीं लिया गया और दूसरा ये कि NHAI से रास्ते की इजाज़त HUDA विभाग ने जनहित के नाम पर ली, ना कि बिल्डर ने खुद, या हुडा विभाग ने बिल्डर के नाम पर।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *