कैथल का टोंपियों वाला गुरूद्वारा है हिंदू-सिख एकता की मिसाल, साथ होती है आरती और गुरबानी

कला-संस्कृति

Yuva Haryana

Kaithal, (20 March 2018) 

प्रदेश में एक जिला ऐसा भी है जहां मंदिर और गुरुद्वारा की आरती और गुरुबानी एक साथ होती है। सुबह 4.30 बजे-वाहे गुरु जी दा खालसा, वाहे गुरु जी दी फतह के साथ गुरुग्रंथ साहिब का प्रकाश और सेवा का आरंभ होता है तो, 6 बजे गुरबाणी कीर्तन और आरती की गूंज सुनाई देती है।

ठीक सवा 7 बजे सुखमणि साहिब का पाठ, सवा 8 से साढ़े 8 बजे प्रार्थना के शब्द, फिर साढ़े 9 बजे हरिकथा में सुनाई देती है। यहीं प्रकिया हर रोज शाम को होती है।

 

यह सब हो रहा है कैथल के टोपियों वाला गुरुद्वारा और सेवापंथी आश्रम हरिमंदिर में। इस दौरान यहां हिंदू और सिख मिलकर एक साथ सनातन धर्म की आरती उतारते हैं और गुरबाणी का पाठ करते हैं। यहां के संत टोपी पहनते हैं, इसलिए यह गुरुद्वारा टोपियों वाला के नाम से प्रसिद्ध है।

इस समय इसकी गद्दी पर महंत हरीशलाल विराजमान है। वे बताते है कि 1704 में आनंदपुर के मैदान ए जंग में भाई कन्हैया साहिब ने जल पिलाने की सेवा की थी। उन्होंने सभी धर्मों के घायल सैनिकों को पानी पिलाकर मानवता का संदेश दिया था। 10वें गुरु गुरु गोबिंद सिंह ने भाई कन्हैया की जल पिलाने की सेवा से प्रसन्न होकर वरदान दिया था कि आगे चलकर आपकी सेवा से सेवापंथी पंथ चलेगा। उन्हीं की शिष्य परंपरा में श्रीसंत भाई सेवाराम जी, उनके आगे श्री संत भाई अडैण राम जी रहे। जिनके अनेक चेले हुए। उन्हीं में से एक संत भाई श्री कृपाराम जी हुए, जिन्होंने कैथल सेवा पंथी आश्रम हरिमंदिर शुरू किया।

बता दें कि यह हिंदू-सिख एकता का प्रतीक है, मानवता की मिसाल है।

 

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