हुड्डा सरकार के समय DLF से रॉबर्ड वाड्रा की डील का सच आएगा सामने, 8-10 दिन में सार्वजनिक हो जाएगी ढींगरा रिपोर्ट

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Sahab Ram, Yuva Haryana
Chandigarh, 19 May, 2018
राज्य में कांग्रेस पार्टी के दस साल के राज के दौरान गुड़गांव में रियल एस्टेट कम्पनी डीएलएफ के साथ रॉबर्ट वाड्रा की कम्पनी के जमीन सौदे से जुड़े राज सामने आ सकते हैं। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा है कि जस्टिम ढींगरा आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को दो महीने का समय दिया है और यह अवधि आगे आने वाले आठ-दस दिन में पूरा होने वाली है। जल्द ही हाई कोर्ट फैसला कर देगा और रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने यह बात आज एक कार्यक्रम के दौरान कही। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा और रॉबर्ट वाड्रा के विषय को उजागर करने का काम मीडिया, जनता और हमने भी किया था जिसके कारण से जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया और भाजपा को चुना।
खट्टर ने कहा कि हमने आते ही कहा था कि हम जनता के विकास का काम करेंगें, हम पहले की सरकारों की तरह पचड़ों में नहीं पड़ेंगें।
मुख्यमंत्री ने विशेष बात यह कही कि कोर्ट, सीबीआई और विजिलेंस के पास जो सामग्री है, उसके अनुसार वो कहीं भी छूटते हुए दिखाई देते नहीं हैं। उन्होंने कहा कि 48 सालों में जो काम नहीं हुआ वह हरियाणा सरकार और केंद्र की मोदी सरकार ने करके दिखाया है। उन्होंने कहा कि हरियाणा की सरकार ने भष्टाचार पर नकेल कसने का काम किया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में कानून व्यवस्था का राज पूरी तरह से कायम है
उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार का एक पूरा सर्कल होता है जिसमें नेता, ब्यूरोक्रेट्स, कर्मचारी और जनता के लोग शामिल होते हैं तथा कांग्रेस सरकार के समय में मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री सभी पर आरोप लगाए गए हैं और उन पर आकाश-पाताल और जमीन को खाने तक के आरोप लगे। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार एक आदमी नहीं कर सकता है, बल्कि इसका एक पूरा सर्कल होता है और कांग्रेस सरकार के समय में भ्रष्टाचार रहा।
कांग्रेस राज में सीएलयू को लेकर बड़े पैमाने पर हेरा-फेरी की गई जो कि आज सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के माध्यम से निकल कर सामने आ रही है और घबराहट बनी हुई है।
सीएलयू की बात करते हुए सीएम ने कहा कि हरियाणा में वर्ष 1990 में सीएलयू प्रणाली को शुरू किया गया है और सीएलयू देने का अधिकार केवल पहले नगर एवं ग्राम आयोजना विभाग के निदेशक को था लेकिन बाद में एक व्यवस्था बनाई गई जिसके तहत सीएलयू से संबंधित सभी फाइलें मुख्यमंत्री कार्यालय में जाने लगी और वहां से सीएलयू की मंजूरी होती थी। इस व्यवस्था को बदलने के लिए वर्ष 1996, 2001 और 2006 में कहा गया लेकिन हमने वर्ष 2016 में इस मंजूरी को दोबारा से नगर एवं ग्राम आयोजना विभाग के निदेशक को सौंप दिया।
उन्होंने कहा कि उनकी सरकार पर आरोप लगाए जाते हैं कि हम बदले की भावना से कार्य कर रहे हैं लेकिन अगर हमने बदले की भावना से कार्य करना होता है तो साढे तीन साल पहले ही आते ही कर देते। हमको कोई जरूरत नहीं हैं और हमारा कोई रोल नहीं हैं।
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