हॉट लोकसभा सीटः सिरसा में इस बार इनेलो को मिलेगी कड़ी टक्कर, कांटे की होगी टक्कर

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Sahab Ram, Yuva Haryana
Chandigarh, 03 April, 2019

सिरसा संसदीय क्षेत्र में इस बार इनेलो की राह आसान नहीं है। हर बार इनेलो पहले या दूसरे नंबर पर रहती है। इनेलो का गढ़ कहे जाने वाला सिरसा संसदीय क्षेत्र में इस बार मुकाबला कांटे की टक्कर का होने की संभावना है। यहां पर मौजूदा इनेलो के सरदार चरणजीत सिंह रोड़ी सांसद हैं।

इनेलो, बीजेपी, कांग्रेस, जेजेपी और आप ने अभी तक इस संसदीय क्षेत्र में प्रत्याशियों के पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन कांग्रेस में कहीं ना कहीं अशोक तंवर की ही टिकट पक्की मानी जा रही है। अशोक तंवर 2009 में यहां से सांसद चुने गए थे, उसके बाद 2014 के चुनाव में वो इनेलो के चरणजीत सिंह रोड़ी से चुनाव हार गए थे। इस बार मुकाबला जबरदस्त होने की संभावना है।

यह लोकसभा सीट हरियाणा बनने के बाद से ही अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित चली आ रही है।  1998 और 1999 में लोकदल से सुशील इंदौरा यहां सांसद बने। यह सीट लम्बे समय तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दलबीर सिंह के नाम से जानी जाती थी जो 1967, 1971, 1980 और 1984 में यहां से कांग्रेस के सांसद बने। दलबीर सिंह आपातकाल के बाद 1977 में यहां से चुनाव हारे भी थे। इसके बाद उनकी बेटी कुमारी सैलजा भी यहां से 1991 और 1996 में चुनाव जीतकर संसद पहुंची। पंजाब और राजस्थान की सीमा से लगी इस विधानसभा सीट में फिलहाल सिरसा जिला, फतेहाबाद जिला और जींद जिले का नरवाना विधानसभा क्षेत्र आता है। इस संसदीय क्षेत्र पर चौधरी देवीलाल परिवार का भी खासा असर रहता है क्योंकि परिवार का गृहक्षेत्र सिरसा में ही है।

2014 के लोकसभा चुनाव में सिरसा सीट पर कांग्रेस पार्टी ने अपने सांसद और प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को दोबारा टिकट दी थी। अशोक तंवर छात्र राजनीति और फिर युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहकर 2009 में पहली बार चुनावी राजनीति में आए थे। पहले ही चुनाव में अशोक तंवर ने सिरसा से शानदार जीत हासिल की और संसद पहुंचे। अशोक तंवर कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहने के बाद सबसे कम उम्र के युवा कांग्रेस अध्यक्ष बने। झज्जर जिले के चिमनी गांव में जन्मे अशोक तंवर ने दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से भारतीय इतिहास में पीएचडी की है।

2009 में चुनाव से एक महीना पहले ही टिकट मिलने पर सिरसा पहुंचकर अशोक तंवर ने अपने लिए माहौल तैयार किया और जीतकर संसद पहुंचे। तंवर राहुल गांधी के बेहद करीबी हैं और इसी आधार पर उन्होंने टिकट हासिल की और लोगों से वोट मांगे। अशोक तंवर की पत्नी अवंतिका तंवर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ललित माकन की बेटी हैं और देश के राष्ट्रपति रहे शंकर दयाल शर्मा की दोहती हैं। 2014 लोकसभा चुनाव से कुछ दिन पहले 14 फरवरी को अशोक तंवर को हरियाणा कांग्रेस का अध्यक्ष घोषित किया गया लेकिन उनके नेतृत्व में उस साल हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को करारी हार झेलनी पड़ी।

2014 लोकसभा चुनाव में अशोक तंवर को 30.54 फीसदी वोट मिले जो 2009 में उन्हें मिले 42.35 फीसदी वोटों से काफी कम थे। चुनाव के समय यहां की चार सीटों पर कांग्रेस समर्थित विधायक थे। अक्टूबर 2014 में हुए विधानसभा के चुनावों में इस लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं बना। अब एक बार फिर कांग्रेस की तरफ से अशोक तंवर का ही नाम आगे है। अशोक तंवर को चुनावी मैदान में उतारने की घोषणा हरियाणा कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद कर भी चुके हैं।

सिरसा सीट पर इनेलो के उम्मीदवार इस बार चरणजीत सिंह रोड़ी थे जो 2009 में कालांवाली विधानसभा सीट से अकाली दल की टिकट पर विधायक बने थे। चरणजीत सिंह को 39.59 फीसदी वोट मिले जो पार्टी को पिछले लोकसभा चुनाव में मिले वोटों से 0.85 फीसदी ज्यादा थे। चरणजीत सिंह को यहां इनेलो के मजबूत आधार का फायदा मिला और खासकर नरवाना, फतेहाबाद, रतिया, कालांवाली, डबवाली, रानियां, सिरसा और ऐलनाबाद में उन्हें काफी अच्छे वोट मिले। टोहाना में वे कांग्रेस से और फतेहाबाद में थोड़े से वोटों से हजकां से पिछड़े लेकिन बाकी सात क्षेत्रों में पहले नंबर पर रहे। कुछ महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने यहां की आठ सीटें (अकाली दल समेत) जीती। चरणजीत सिंह की किस्मत इतनी अच्छी रही कि वे पहले ही चुनाव में विधायक और उसके बाद पहले ही चुनाव में लोकसभा सदस्य बन गए।

सिरसा सीट पर भाजपा-हजकां गठबंधन की तरफ से हजकां के डॉ. सुशील इंदौरा चुनाव मैदान में उतरे थे। गठबंधन के तहत यह सीट पहले भाजपा के पास थी लेकिन ऐन वक्त पर भाजपा ने करनाल सीट हजकां से ले ली और सिरसा सीट दे दी। हजकां के पास यहां से कोई मजबूत उम्मीदवार भी नहीं था जबकि करनाल से खुद चंद्रमोहन के चुनाव लड़ने का ऐलान किया जा चुका था जिसे वापस लेना पड़ा। सिरसा सीट के लिए हजकां ने नामांकन के आखिरी दिन कांग्रेस नेता सुशील इन्दौरा को ज्वाइन करवाया और टिकट थमा दी।

सुशील इन्दौरा 1998 और 1999 में सिरसा सीट से ही इनेलो के सांसद रहे थे। 2004 का लोकसभा चुनाव वे कांग्रेस के आत्मा सिंह गिल से हार गए तो पार्टी ने उन्हें 2009 में टिकट नहीं दी और सुशील इन्दौरा इनेलो छोड़ कांग्रेस में चले गए। उन्होंने उसी साल कालांवाली सीट से विधानसभा चुनाव भी लड़ा लेकिन हार गए। खैर, 2014 लोकसभा चुनाव में सुशील इंदौरा को टिकट तो मिल गई लेकिन हजकां या भाजपा की तरफ से चुनाव प्रचार में ज्यादा मदद नहीं मिली। हजकां के तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं का ध्यान हिसार में कुलदीप बिश्नोई के चुनाव पर था और भाजपा ने भी विशेष तौर पर यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली तय करके भी रद्द कर दी। सुशील इंदौरा को आखिरकार 18.85 फीसदी वोट मिले जबकि पिछले चुनाव में तो पार्टी उम्मीदवार को सिर्फ 5.23 फीसदी वोट ही मिले थे।

सुशील इंदौरा को फतेहाबाद और सिरसा विधानसभा क्षेत्रों से अच्छे वोट मिले। फतेहाबाद में तो वे पहले स्थान पर रहे। उन्हें सबसे कम वोट डबवाली और रानियां सीटों पर मिले। विधानसभा चुनावों में हजकां यहां कोई सीट नहीं जीत पाई और भाजपा को भी सिर्फ टोहाना सीट पर ही जीत मिली। जब तक यह सीट भाजपा के खाते में नजर आ रही थी तब तक इस सीट पर टिकट के लिए आईआरएस अधिकारी रही सुनीता दुग्गल की दावेदारी काफी मजबूत थी। सुनीता दुग्गल लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए ही ऐन वक्त पर अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर आई थीं लेकिन सीटों की अदलाबदली से उनका चुनाव लड़ना लटक गया। दुग्गल ने बाद में रतिया से विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन थोड़े से अंतर से वे चुनाव हार गईं। हालांकि इस बार के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की तरफ से सुनीता दुग्गल की दावेदारी काफी पक्की मानी जा रही है। सुनीता दुग्गल सिरसा संसदीय क्षेत्र में पिछले लंबे समय से डटी हुई हैं।

आम आदमी पार्टी उम्मीदवार पूनमचंद रती को सिरसा सीट पर मामूली वोट ही मिले। रतिया सीट पर जरूर उन्होंने दस हजार से ज्यादा वोट लिए। वहीं इस बार जेजेपी की तरफ से भी दांव खेला जाएगा। जेजेपी का यह पहला लोकसभा चुनाव होगा। जेजेपी ने सिरसा संसदीय क्षेत्र में दावेदारों के आवेदन मांगे हैं।

सिरसा सीट इनेलो का मजबूत क्षेत्र रही है लेकिन पिछले दस सालों से कांग्रेस ने यहां दबदबा बनाया हुआ था। चैधरी दलबीर सिंह और फिर कुमारी सैलजा के समय भी यह सीट कांग्रेस की मजबूत सीट थी। 2014 में इनेलो ने वापसी की जिसका फायदा पार्टी को विधानसभा चुनाव में भी हुआ।

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