हॉट लोकसभा सीटः इस बार कुरुक्षेत्र में मुकाबला होगा रोचक, धर्मनगरी में उतरेंगे दिग्गज

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Sahab Ram, Yuva Haryana
Chandigarh, 30 March, 2019

कुरुक्षेत्र संसदीय क्षेत्र में इस बार मुकाबला रोचक और कड़ा होने की संभावना है। हर बार सामान्य चुनावी माहौल में रहने वाली यह लोकसभा सीट इस बार हॉट सीट होने की संभावना है। इस बार इस सीट पर सभी पार्टियों के बीच कड़ी टक्कर होने की संभावना है। यहां पर मौजूदा सांसद राजकुमार सैनी अपनी नई पार्टी बना चुके हैं, तो यहां पर हारे हुए पूर्व सांसद नवीन जिंदल भी दोबारा तैयारी में उतर चुके हैं। वहीं इनेलो, जेजेपी, आप और बीजेपी भी यहां पर जीत के लिए जीतोड़ मेहनत कर रही है।

1977 में बनी कुरूक्षेत्र लोकसभा सीट के मौजूदा स्वरूप में कैथल जिला, कुरूक्षेत्र जिला और यमुनानगर का रादौर विधानसभा क्षेत्र आता है। कुरूक्षेत्र सीट बनने से पहले इस क्षेत्र में कैथल लोकसभा सीट होती थी। 1957, 1962, 1967 और 1971 में कैथल लोकसभा सीट पर हुए चुनावों में हर बार कांग्रेस पार्टी ने जीत हासिल की। 1967 और 1971 में तो कैथल से गुलजारी लाल नंदा सांसद बने थे जो दो बार देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। नंदा पहली बार 1964 में जवाहर लाल नेहरू और दूसरी बार 1966 में लाल बहादुर शास्त्री के निधन पर कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने थे। प्रधानमंत्री बनने के समय वे कैथल से सांसद नहीं थे। 1977 में बनी कुरूक्षेत्र लोकसभा सीट पर मुख्य रूप से बनिया और सैनी समाज से ही सांसद बने हैं। यह सीट उद्योगपति जिंदल परिवार की भी पसंदीदा सीट रही है। ओमप्रकाश जिंदल एक बार और उनके बेटे नवीन जिंदल दो बार यहां से सांसद रहे।

2014 में यहां से कांग्रेस पार्टी ने अपने लगातार दो बार के सांसद नवीन जिंदल को ही टिकट दी थी। नवीन जिंदल ने 2004 में अपने पिता ओमप्रकाश जिंदल की सक्रियता वाली इस लोकसभा सीट से ही राजनीति की शुरूआत की थी। 2004 और 2009 में शानदार जीत के बाद 2014 में नवीन जिंदल को यहां काफी कड़ी चुनौती मिली। देश भर में कांग्रेस की कम हुई लोकप्रियता और भाजपा के पक्ष की लहर में नवीन जिंदल भी बह गए और जीतना तो दूर, नतीजों में तीसरे स्थान पर खिसक गए। जिंदल को 25.33 प्रतिशत वोट मिले जबकि 2009 में उन्हें करीब 45 फीसदी वोट मिले थे। नवीन जिंदल इस क्षेत्र में ओमप्रकाश जिंदल ट्रस्ट के जरिए कई तरह के सामाजिक काम करते थे जिससे लोगों में काफी हद तक उनकी लोकप्रियता बनी रही।

चुनाव में जिंदल को शाहबाद, पेहोवा, गुहला और कैथल सीटों पर अच्छे वोट मिले थे। चुनाव के समय शाहबाद, पेहोवा और कैथल में तो कांग्रेस के ही विधायक थे। पेहोवा में वे पहले स्थान पर रहे। कलायत और पुंडरी क्षेत्र में लोगों ने नवीन जिंदल को बहुत कम वोट दिए। 5 महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस इस लोकसभा क्षेत्र से सिर्फ रणदीप सुरजेवाला की कैथल सीट ही जीत पाई। अब तीसरी बार फिर से कांग्रेस की तरफ से नवीन जिंदल को टिकट मिलना लगभग तय है।

भारतीय जनता पार्टी ने कुरूक्षेत्र सीट पर राजकुमार सैणी को टिकट दी थी जो 1996 में हविपा की टिकट पर नारायणगढ़ सीट से विधायक रहे थे। राजकुमार सैनी ने 2000 और 2009 में भी नारायणगढ़ से निर्दलीय चुनाव लड़ा लेकिन मुकाबले में नहीं आ सके। चुनाव से कुछ समय पहले की भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन करने वाले राजकुमार सैनी का कुरूक्षेत्र से लोकसभा टिकट ले आना चर्चा का विषय रहा क्योंकि उनकी सक्रियता वाला विधानसभा क्षेत्र और जिला इस लोकसभा का हिस्सा ही नहीं है। इस सीट से पहले सैणी जाति से सांसद जरूर बने थे लेकिन वे इनेलो और इसके पुराने स्वरूप जनता दल से रहे थे।

राजकुमार सैणी को शामिल करवाना और टिकट देना भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत फायदेमंद रहा और पहली बार यहां से भाजपा ने चुनाव जीता। इससे पहले पार्टी यहां कभी दूसरे स्थान पर भी नहीं आई थी। राजकुमार ने 4 लाख 18 हजार वोट लिए जो कुल वोटों का 36.80 प्रतिशत था। जीतने वाले उम्मीदवारों में यह सोनीपत के बाद सबसे कम वोट प्रतिशत था। उनकी जीत इनेलो के उम्मीदवार से लगभग 1 लाख 30 हजार वोटों की थी। लोकसभा चुनाव के समय कुरूक्षेत्र सीट के तहत आने वाले नौ विधानसभा क्षेत्रों में से एक में भी भाजपा का विधायक नहीं था लेकिन 5 महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने यहां की 9 में से 5 सीटों पर जीत हासिल की। 1-1 सीटें कांग्रेस और इनेलो ने जीती व 2 सीटों पर निर्दलीय विधायक बने। 2009 में यहां से भाजपा ने उम्मीदवार खड़ा ही नहीं किया था और गठबंधन के तहत सीट इनेलो के पास थी। हालांकि बाद में राजकुमार सैनी ने बीजेपी से बगावत शुरु कर दी और कुछ समय बाद ही बीजेपी से अलग-थलग पड़ गए और पहले अपना लोकतंत्र सुरक्षा मंच स्थापित किया और बाद में अपनी पार्टी बना ली। अब राजकुमार सैनी की पार्टी और बीएसपी का हरियाणा में गठबंधन है और दोनों पार्टियों के मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना है।

कुरूक्षेत्र सीट पर इनेलो ने बलबीर सिंह सैणी को टिकट दी थी जिन्होंने कुछ समय पहले ही पार्टी ज्वाइन की थी। बलबीर सैणी का यह पहला लोकसभा चुनाव था। इससे पहले 2009 में यहां से इनेलो की टिकट पर अशोक अरोड़ा और 2004 में अभय सिंह चैटाला ने चुनाव लड़ा था। उससे पहले इनेलो की टिकट पर कैलाशो सैणी यहां से दो बार चुनाव जीती थी। बलबीर सैणी का प्रदर्शन खास नहीं रहा और वे 25.39 फीसदी वोट लेकर दूसरे स्थान पर ही आ पाए। पार्टी को 2009 में लगभग 32 फीसदी वोट मिले थे। चुनाव के समय रादौर, लाडवा, शाहबाद और कलायत में इनेलो के विधायक थे। बलबीर सैणी को कलायत और पेहोवा में ही अच्छे वोट मिले। कलायत में तो उन्हें करीब 17 हजार वोटों की बढ़त मिली। बलबीर सैणी भाजपा उम्मीदवार राजकुमार सैणी के रिश्तेदार थे और चुनाव में मुकाबला होने पर सैणी मतदाता मोदी लहर की वजह से राजकुमार सैणी की ओर झुक गया। 5 महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में इनेलो इस लोकसभा क्षेत्र से सिर्फ पेहोवा सीट ही जीत पाई।

कुरूक्षेत्र सीट पर बसपा और आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा। पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा ने यहां करीब 17 फीसदी वोट लिए थे जो इस बार घटकर 6 फीसदी रह गए। चतर सिंह ने कलायत सीट पर 13 हजार से ज्यादा वोट लिए।

इस बार के चुनाव में कुरुक्षेत्र में मुकाबला रोचक होने की संभावना है। इस बार कांग्रेस फिर से नवीन जिंदल को चुनावी मैदान में लाने की तैयारी में है वहीं सांसद सैनी खुद यहां से ताल ठोक सकते हैं। बीजेपी ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन बीजेपी भी यहां पर मजबूत प्रत्याशी के साथ उतरने की तैयारी में है वहीं इनेलो,जेजेपी और आप की तऱफ से भी इस सीट पर खास नजर बनाए हुई है।

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