हरियाणा में भी हुए हैं कई बार कर्नाटक की तरह ‘नाटक’

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अनिल आर्य,राजनीतिक विश्लेषक की कलम से…

हरियाणा की राजनीति में भी कई बार कर्नाटक जैसे नाटक हुए हैं। यहां तक कहना भी सही रहेगा कि इस तरह की घटनाओं का हरियाणा जन्मदाता रहा है। हिन्दूस्तान में इस तरह की राजनैतिक तोड़फोड़ की शुरुआत “आया राम-गया राम” से हुई। सन् 1966 में हरियाणा हिन्दूस्तान का 17वां राज्य बना। पहले मुख्यमंत्री पद के लिए पंडत भगवत दयाल शर्मा और अब्दुल गफ्फार खान के बीच कड़ा मुक़ाबला हुआ। हरियाणा क्षेत्र के तत्कालीन पंजाब विधानसभा व परिषद सदस्यों ने पंडत जी को पहला मुख्यमंत्री चुना। अलग प्रदेश बनने के कुछ महीने बाद ही फरवरी 1967 में चुनाव हुए।

कांग्रेस के 48 विधायक विजयी रहे और पंडत भगवत दयाल शर्मा फिर से हरियाणा के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। उन्होंने सभी बड़े नेताओं को नजरअंदाज करते हुए, अपने चहेतों को मंत्रिमंडल में ले लिया।

मार्च में विधानसभा का पहला सत्र बुलाया गया। मुख्यमंत्री ने स्पीकर के लिए जींद से विधायक लाला दयाकिशन का नाम सामने रखा। विपक्ष में बैठे जनसंघी नेता मंगलसेन ने कांग्रेस के ही दिग्गज नेता राव बीरेन्द्र का नाम भी स्पीकर के लिए प्रस्तुत कर दिया। ये अपने आप में विचित्र स्थिति थी। मतदान में नेता सदन के उम्मीद्वार लाला दयाकिशन हार गए और प्रदेश में संवैधानिक संकट पैदा हो गया। पंडत जी सलाह लेने दिल्ली चले गए। मंत्री हरद्वारी लाल ने सभी अन्य मंत्रियों से इस्तीफे लेकर राज्यपाल को सौंप दिए। 13वें दिन ही भगवत सरकार गिर गई और शुरु हुआ हरियाणा में राजनैतिक अस्थिरता का दौर, जो एक के बाद एक अन्य राज्यों में दोहराया गया।

इसके बाद राव बीरेंद्र सिंह गठबंधन के मुख्यमंत्री बने। 6 महीने में ही उन्हें कहना पड़ा कि “मेंढ़कों को एक पालडे में नहीं रखा जा सकता”। कई विधायकों ने अपनी निष्ठा एक दिन में दो-दो, तीन-तीन बार बदली। इनमें विधायक रामधारी गौड और गयालाल प्रमुख थे। यही से देश में जन्म हुआ “आया राम- गया राम” की राजनीति का। चौ. भजनलाल ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया और इसे चरम तक लेकर गए। उन्हें इस खेल का पीएचडी माना जाता था। अपनी इस योग्यता का उन्होंने राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर खूब इस्तेमाल किया। 1991 की राव नरसिम्हा सरकार को बहुमत कैसे मिला, ये कहानी राजनीति के सब जानकारों को पता है। भजनलाल सन् 1980 में देवीलाल को हटाकर मुख्यमंत्री बने। 1982 में तो देवीलाल के पास बहुमत था। लेकिन अल्पमत में होते हुए भी भजनलाल ने सरकार बना ली। इसी प्रकरण में तत्कालीन गवर्नर तपासे के साथ हुई घटना पर आज भी लोग चटकारे लेते हैं।

सन् 1990 में भी देवीलाल के केन्द्र में चले जाने के बाद मुख्यमंत्री के पद को लेकर रणजीत सिंह व औमप्रकाश चौटाला की रस्साकशी में सरकार गिरी। कई मुख्यमंत्री कुछ महीनों में ही बदले गए। सन् 1999 में हरियाणा विकास पार्टी की फूट का नुकसान बंशीलाल को हुआ। इसका फायदा औमप्रकाश चौटाला उठाया। औमप्रकाश चौटाला ख़ूब कहते थे कि “ हमने ये सरकार तो जुगाड़ से बनाई है, हमारी अगली सरकार प्योर होगी ”। सन् 2009 में कुलदीप की राजनैतिक अपरिपक्वता का लाभ भूपेन्द्र हुड्डा ने उठाया। कुलदीप बिश्नोई को छोड़कर हजकां के सभी विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर मंत्री बना दिया और आराम से सब कुछ मैनेज करके 5 साल सरकार चलाई।

 

सत्ता प्राप्त करने के लिए सभी राजनैतिक दल व नेता बड़े से बड़ा नाटक करते हैं, झूठ बोलते हैं, जनता का बेवकूफ बनाते हैं। चुनाव के बाद विपरीत विचारधारा वाले दलों से समझौते करके, ये संदेश देते हैं कि हमारी सत्ता प्राप्त करने के अलावा कोई विचारधारा नहीं है। खैर कहा जा सकता है, मौजूदा कर्नाटक जैसे नाटक हरियाणा में कई बार हो चुके हैं।

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