PGI में बढ़ाता मरीजों का दबाव

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चिकित्सा, शिक्षा और अनुसंधान में अग्रणी पीजीआई संस्थान खुद एक लाइलाज बीमारी का शिकार है। इसमें मरीजों की बढ़ती संख्या का मर्ज बढ़ता जा रहा है। इस कारण संस्थान के जूनियर डॉक्टर हर तरफ से दबाव झेलने को विवश हैं। जानकारी के मुताबिक जूनियर डॉक्टरों पर काम का बोझ इतना डाला जाता है जैसे कि वह इंसान न होकर कोई मशीन हों। दूसरी और सीनियर डॉक्टरों की अपनी मजबूरियां हैं।
पीजीआई में प्रबंधन व व्यवस्था के लिए अनेक कमेटियां गठित होती हैं जिनमें सीनियर डॉक्टर शामिल किए जाते हैं। इन कमेटियों की बैठकों में डॉक्टरों का काफी समय खर्च हो जाता है। इसके अलावा अनेक कार्यशालाएं निरंतर आयोजित होती रहती हैं। ऐसे में सीनियर डॉक्टरों के काम का बोझ भी जूनियर डॉक्टरों को वहन करना पड़ता है।
बाहर के राज्यों से आने वाले नए जूनियर डॉक्टर भाषा, खानपान व सांस्कृतिक भिन्नता आदि समस्यायों से जूझते दिखाई देते हैं। दरअसल पीजीआई में पिछले 5 सालों से बिस्तरों की संख्या 1948 पर ही स्थिर है। जबकि उपचार के लिए आने वाले मरीजों की संख्या में भारी वृद्धि हो चुकी है। संस्थान  में दाखिल मरीजों के लिए 1740 बेड उपलब्ध हैं तथा 208 बेड अॅाब्जर्वेशन पर रखे गए मरीजों के लिए होते हैं।
 2012-13 में आउट डोर मरीजों की तादाद 1911400 थी जो 2016-17 में बढ़कर 2555455 तक पहुंच गई। इनडोर मरीजों की तादाद 2012-13 में 72382 रही और 2016-17 में बढ़कर 89584 तक पहुंच गई।
आंकड़ों के मुताबिक पीजीआई में सबसे ज्यादा रोगी पंजाब से आते हैं। 2016-17 में पंजाब से 932033 मरीज पीजीआई में पहुंचे। चंडीगढ़ से 548072 रोगी, हरियाणा से 493591, हिमाचल से 291042, जम्मू-कश्मीर से 61567,उत्तराखंड से 31155 तथा अन्य इलाकों से 77744 मरीज उपचार के लिए पीजीआई पहुंचे थे।

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