बसपा का बल – 2009 में गैर-कांग्रेसी और 2014 में गैर-भाजपाई सरकार बनवा सकता था हाथी और चश्मे का मेल

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बसपा से इनेलो का गठबंधन क्या मायने रखता है, हरियाणा के सारे राजनीतिक चासड़ू लोग इस पर जोड़-घटा करके देख रहे हैं लेकिन तस्वीर किसी के जहन में साफ नहीं है। चूंकि इस जोड़ी ने बस एक लोकसभा चुनाव ही 20 साल पहले 1998 में साथ लड़ा था, इसलिए इनके साथ आने का ज्यादा आंकलन अभी आसान भी नहीं है।
जिस पार्टी का पिछले 4 चुनावों से बस 1-1 MLA ही बनता आ रहा है, उससे किसी को कितना फायदा हो सकता है ?

क्या यह नया गठबंधन वाकई कोई कमाल कर सकता है ?

परिसीमन के बाद हुए दो विधानसभा चुनावों में इन दोनों दलों को हर सीट पर मिले वोटों का अगर आंकलन करें तो यह सौदा हर हाल में इनेलो के लिए मुनाफे वाला दिखता है। इतना मुनाफे वाला कि 2009 चुनाव में अगर दोनों दल साथ होते (यानी हर सीट पर इनेलो-बसपा को मिले वोट जोड़ लिए जाएं) तो उस साल सरकार इनेलो-बसपा की बनती, ना कि कांग्रेस की।
उस सूरत में राज्य की नारायणगढ़, सढ़ौरा, शाहाबाद, राई, टोहाना, सोहना और पृथला सीटों पर कांग्रेस की बजाय इनेलो के विधायक बनते। इनके अलावा पुंडरी, असंध और पानीपत ग्रामीण में निर्दलीयों की बजाय और दादरी में हजका के स्थान पर इनेलो के उम्मीदवार जीतते। यानी इनेलो का बसपा से गठबंधन कांग्रेस की 7 सीटें कम कर देता और 3 निर्दलीयों और 1 हजका के विधायक की जगह भी इनेलो के विधायक बनते। बसपा का एक विधायक जगाधरी से बना ही था।
यह स्थिति 2009 में इनेलो(+बसपा) को 44 सीटों पर ले जाती और कांग्रेस के पास होते 33 विधायक ( 2009 में कुल 40 जीते थे कांग्रेस की टिकट पर)। सरकार किसकी बनती, आप समझ सकते हैं।

(यह आंकलन चुनाव में दोनों दलों को अकेले अकेले लड़ते हुए मिले वोटों के आधार पर है। असल में गठबंधन होने पर आमतौर तो कुल वोट और ज्यादा बढ़ते हैं क्योंकि माहौल बनने पर इधर-उधर गए लोग भी जीतते नजर आ रहे उम्मीदवार की तरफ आ जाते हैं। कुछ मौकों पर वोट घट भी सकते हैं, लेकिन वैसा कम ही होता है।)

इसी तर्ज पर अगर साल 2014 में यह गठबंधन होने का आंकलन करें तो इनेलो के पाले में 8 सीटें (मुलाना, सढ़ौरा, शाहाबाद, घरौंडा, असंध, इसराना, राई, सफीदों) बढ़ जाती जिनमें से 6 भाजपा के खाते से आती और राई सीट कांग्रेस के खाते से तथा सफीदों निर्दलीय के खाते से। तब भाजपा 41 सीटों पर होती और उसे सरकार बनाने के लिए निर्दलीयों की ओर ताकना पड़ता जिनकी संख्या 4 रह जानी थी। इनेलो-बसपा के पास 29 सीटें होती। कांग्रेस-हजका के पास 16 सीटें होती। गैर-भाजपा सरकार बनवा सकती थी तब बसपा।

एक सत्य यह भी है कि 2014 में अगर बसपा का भाजपा के साथ गठबंधन होता तो भाजपा की सीटें 7 बढ़ जाती और अगर कांग्रेस के साथ होता तो कांग्रेस की सीटें 5 बढ़ जाती।

 

यानी बसपा हरियाणा के हर दल के लिए फायदे वाला साथी है लेकिन इसका सबसे ज्यादा और निर्णायक फायदा उठाने की स्थिति में इनेलो ही है।

(All information is compiled from book ‘दिलबदल हरियाणा’ by Deepkamal Saharan)

 

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