देश को गोल्ड मेडल दिलाने वाला यह नेशनल चैंपियन कुल्फी बेचने को है मजबूर, पढ़िए पूरी खबर

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Shweta Kushwaha, Yuva Haryana 

Bhiwani, 27 Oct, 2018

सब जूनियर नेशनल बॉक्सिंग में लगातार चार साल जिस खिलाड़ी ने देश को गोल्ड मेडल दिलवाया, आज वह खुद कुल्फी की रेहड़ी लगाने को मजबूर हो गया है। गरीबी और किस्मत ने उदीयमान खिलाड़ी के सभी सपनों को चकना- चूर कर दिया।

भिवानी के खाड्डी मोहल्ला निवासी दिनेश, जो सब जूनियर नेशनल बॉक्सिंग में 51 किलो भार वर्ग में लगातार चार साल तक चैंपियन रहा, उसकी हालत खिलाड़ियों के प्रति सरकार के सभी दावे बयान करती है। दिनेश चाहता था कि वह ओलंपिक और राष्ट्रमंडल खेलों में जीत हासिल कर अपने देश का नाम रोशन करता, लेकिन गरीबी की मार ने उसके सभी सपने तोड़ दिए। इतना ही नहीं आज वह कुल्फी बेचने पर मजबूर है।

दिनेश की मां काफी बीमार रहती हैं, जिनके इलाज में काफी पैसा खर्च होता है। पिता कुल्फी की रेहड़ी लगाते हैं और घर के पालन- पोषण के लिए दिनेश उनका साथ देता है।

अपना दर्द सांझा करते हुए दिनेश ने बताया कि आमतौर पर स्टेट चैंपियन को ही नेशनल लेवल के लिए चयनित किया जाता है, लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं हुआ और स्टेट में गोल्ड जितने के बाद भी उसकी जगह हमेशा किसी और को भेजा गया। इससे दिनेश की उम्मीदें टूट गई।

दिनेश बताता है कि 2007 में वह साइकिल पर सवार होकर साई (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) खेल छात्रावास जा रहा था कि एक बाइक सवार ने उसे टक्कर मार दी। जिसके चलते उसे नाक और दिमाग में काफी चोटे आईं। गरीबी के कारण उसका ठीक से इलाज नहीं हो पाया। चार साल तक वह सदमें से उभर नहीं पाया।

इतना ही नहीं दिनेश ने कहा कि उसके पिता चाहते थे कि वह कई बड़े स्तर पर पदक हासिल कर देश का नाम रोशन करे। इसके लिए पिता ने पैसे उधार लेकर उज्बेकिस्तान भेजा था। वहां वह मामूली से अंतर से वंचित रह गया। परिवार की आर्थिक हालत खराब होने के चलते उसे अच्छा प्रशिक्षण दिलाना, विदेश भेजना, डाइट दिलाना संभव नहीं था। जिसके चलते उसे खेलों से दूर होना पड़ा।

दिनेश ने खेल में काफी उपलब्धियां हासिल की हैं और देश का नाम रोशन किया है, जिनमें देश व प्रदेश के लिए 17 गोल्ड मेडल, 1 सिल्वर व 5 ब्रांड मेडल शामिल हैं।  दिनाश आज कुल्फी की रेहड़ी लगाने के लिए मजबूर है।

वह कहता है कि उसने देश के लिए सब कुछ किया, लेकिन ना तो इस सरकार ने और ना ही पिछली सरकार ने, किसी ने भी उसके लिए कुछ नहीं किया। एक खिलाड़ी ने गरीबी के चलते अपने सपनों को तोड़ दिया।

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