Home Breaking कारगिल युद्ध की कहानी, सुनिये कैप्टन भूपेंद्र सिंह की जुबानी

कारगिल युद्ध की कहानी, सुनिये कैप्टन भूपेंद्र सिंह की जुबानी

0
0Shares

Yuva Haryana
@Capt. Bhupinder Singh

जब भी कोई युद्ध होता है तो वह युद्ध भले ही सेना सीमा पर लड़ रही होती है, लेकिन पूरा देश उस सेना के साथ खड़ा होता है और युद्ध के परिणाम जाने की एक उत्सुकता रहती है, यही प्रयास होता है कि युद्ध जल्दी से जल्दी समाप्त हो और हम अपना तिरंगा फहराए तथा शांति की घोषणा हो जाए।  कारगिल युद्ध जो आज से 20 साल पहले हुआ था, इस युद्ध में भी ऐसा ही हुआ था, पाकिस्तानी घुसपैठिए कारगिल की चोटियों पर छिपे हुए थे, बंकरों के अंदर से हमला कर रहे थे, अब इंडियन आर्मी नीचे से ऊपर चढऩे का प्रयास कर रही थी, इस युद्ध के शुरूआत में भारतीय वायु सेना की मदद नहीं ली जा रही थी, क्योंकि यदि वायु सेना आती है तो इससे युद्ध और अधिक विकराल रूप ले लेता है, दिक्कत यह भी आ रही थी कि फाइटर प्लेन से बमबारी की जाए तो कैसे की जाए, क्योंकि टारगेट फिक्स करने में दिक्कत आ रही थी, अब ऐसे में पाकिस्तानी घुसपैठियों को  कैसे खदेड़ा जाए और कारगिल की चोटियां जो पाकिस्तानियों के कब्जे में थी उन पर कैसे कब्जा वापस लिया जाए, इस तरह की खबरें उन दिनों अखबरों और टीवी चैनलों में चल रही थी।

मैं भी उन खबरों को बड़े ध्यान से पढ़ता था फिर एक दिन मैने तय किया कि इस युद्ध को लडऩे के लिए मैं भी जाउंगा, हालांकि मेरे को कारगिल में युद्ध के लिए जाना है इस तरह का कोई आदेश नहीं था। मैं उन दिनों भारतीय वायु सेना के हिंडन (गाजियाबाद) में तैनात था, इससे पहले लगातार दो साल तक मैं सियाचीन गलेशियर में रहा था, वहां मुझे पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर उड़ाने का अनुभव था। अब मेरे मन में जो कई दिन से द्वंद चल रहा था कि भले ही मेरी यूनिट को कारगिल नहीं भेजा जा रहा है, लेकिन मैंने वायु सेना में जो हेलीकॉप्टर उड़ाने का अनुभव हासिल किया है अब उस अनुभव का फायदा देश को होना चाहिए और मैं  अपनी मातृभूमि का कर्ज उतारना चाहता हूं। क्योंकि उस समय हर देशवासी बहुत दुखी था जब भी किसी शहीद का शव आता था तो उस पर रोना आता था। युवा सैनिकों के शव देखकर देश में मातम छाया हुआ था।

शहीदों  के शव पर खुद उस समय के प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी भी अपनी आंसू नहीं रोक पाते थे। ऐसे में मेरा भी खून खोल उठा और मैंने तय किया कि मैं अपने कमांडिग आफिसर (सी.ओ. ) के पास जाता हूं और कहता कि सर मुझे कारगिल जाना है, क्योंकि पहाड़ी और दुरगामी क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर से पाकिस्तानी घुसपैठियों की लोकेशन ली जा सकती है, फिर मैं अपने सीओ के पास गया और कहा कि सर मुझे कारगिल में जाने की परमिशन दी जाए। फिर मुझे वहां जाने की परमिशन मिली, एक माह तक मैंने सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया, जहां पर मेरी जरूरत होती थी, उस डयूटी को मैंने बखूबी निभाया, यह सारा युद्ध मेरी आंखों के सामने हुआ। यह लड़ाई करीब 100 किलोमीटर के दायरे में लड़ी गई थी जहां पर करीब 1700 पाकिस्तानी घूसपैठिए  भारतीय सीमा के कऱीब 8 या 9 किलोमीटर अंदर घुसे हुए थे। एक छोटे-से इलाक़े पर सैकड़ों तोपों की गोलेबारी उसी तरह थी जैसे किसी अखऱोट को किसी बड़े हथौड़े से तोड़ा जा रहा हो।

क्योंकि टाइगर हिल की चोटी पर जगह इतनी कम थी कि वहां पर कुछ जवान ही रह सकते थे। उस वक्त बादलों ने 16700 फीट ऊंची टाइगर हिल चोटी को इस कदर जकड़ लिया था कि भारतीय सैनिकों को पाकिस्तानी सैनिक दिखाई नहीं दे रहे थे। फिर मिराज 2000 विमानों ने बम गिरा कर पाकिस्तानी बंकरों को ध्वस्त किया। इससे पहले दुनिया में कहीं भी इतनी ऊंचाई पर इस तरह के हथियार का इस्तेमाल नहीं हुआ था। यहां पर जो सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि करीब करीब 90 डिग्री की सीधी और लगभग असंभव सी चढ़ाई थी। लेकिन जीत हमारी हुई और 26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर टाइगर हिल को पाकिस्तानी घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ‘26 जुलाई’ अब हर वर्ष कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया। इन वीरों ने इस युद्ध में असीम शौर्य का परिचय देते हुए न सिर्फ दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए। यह वीरों के साहस का ही परिणाम था कि विकट परिस्थितियों में पाकिस्तान को मात देकर फिर कारगिल की चोटी पर तिरंगा लहराया। इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से कई अपने जीवन के 20  वसंत भी नहीं देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था।

वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था। मैं इस युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के परिजनों के आगे अपना शीश झुकाता हूं। इस देश के पहरेदारों को, दिल से मेरा सलाम है। ये देश चैन से सोता है, वो पहरे पर जब होता है। कारगिल का युद्ध मैंने अपनी आंखों से देखा है, एक माह मैं यहां कारगिल में रहा, उसके बाद सकुशल अपनी यूनिट में लौटा। लेकिन जब भी 26 जुलाई का दिन आता है, उस दिन को मैं कभी नहीं भूल सकता। मैं पुन: उन वीर सैनिकों के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं जिन्होंने इस युद्ध में अपना सर्वोच्च बलिदान कर दिया।

जय हिंद।

Load More Related Articles
Load More By Yuva Haryana
Load More In Breaking

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

हरियाणा में अब कुरुक्षेत्र, कैथल, करनाल समेत कई जिलों में अगले तीन घण्टों में हल्की बारिश की संभावना, देखें अलर्ट

Yuva Haryana, Chandigarh हरियाणा मे&…