जनतंत्र में जनता की कोई सुनवाई नहीं, एक देश एक कानून की भी परछाई नहीं

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@ डॉ. सुलक्षणा

भ्रम में जी रहे हैं आज भी कुछ लोग,
समझ नहीं पा रहे हैं वो असली रोग।

कहती हूँ उनसे आँखें खोलकर देखो,
जरा न्याय के तराजू में तोलकर देखो,
क्या भारत, रहा है आजादी को भोग।

जनतंत्र में जनता की कोई सुनवाई नहीं,
एक देश एक कानून की भी परछाई नहीं,
सेवक राज कर रहे, बना कैसा ये संयोग।

बस एक चुनाव जीतकर पांच साल नेता रहा,
फिर भी आखिरी सांस तक पेंशन लेता रहा,
पूरी जिंदगी देकर भी हमें पेंशन का वियोग।

जाति धर्म के मुद्दों को हर रोज ये उछालते,
फिर फैला अफवाह ये अग्नि में घी डालते,
दंगे की आग बुझने पर आते मनाने शोक।

हर सिर पर छत और हर तन पर कपड़ा नहीं,
खाली पेट सो जाने को ये मानते दुखड़ा नहीं,
हमें बरगलाने को करते हैं ये झूठी नोकझोंक।

अपनी सुविधाओं का रखते ये ध्यान हमेशा,
हमें लूटने को अपनाते ये राजनीति का पेशा,
अमीरों की गुलामी करते, चाटते जूते की नोक।

गरीब पहले से गरीब हो गया, ये बने धनवान,
भारत में इनकी सच्चाई से कोई नहीं अनजान,
बस समझ नहीं पा रहे कैसे लगे इन पर रोक।

नेता और अमीर को छोड़कर बाकी गुलाम हैं,
आज़ादी के नाम पर देने पड़ रहे हमें दाम हैं,
अंग्रेजी की गुलामी में भुला दिए दोहे श्लोक।

जब तक सही मायने में आजाद नहीं हो जाते,
कल की फिक्र किये बिना आज नहीं सो जाते,
जब तक जरूरतें बाकी रहेंगी पूरे होते रहेंगे शौक,

बोलो झूठी आज़ादी की खुशी कैसे मनाऊँ मैं,
भारत के कोने कोने का दर्द कैसे भुलाऊँ मैं,
“सुलक्षणा” ने बता दी कड़वी सच्चाई सीना ठोक।

©® डॉ सुलक्षणा

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