Home कला-संस्कृति चोगरदे तै बाग हरया, घनघोर घटा सामण की

चोगरदे तै बाग हरया, घनघोर घटा सामण की

0
0Shares

Yuva Haryana News
@सोनिया जांगड़ा

चोगरदे तै बाग हरया , घनघोर घटा सामण की
छोरी गावें गीत सुरीले झूल घली कामण की
सूर्यकवि दादा लख्मीचन्द जी की सामण की रागिणी मे तीज त्यौहार का वर्णन कितनी सुंदरता से किया गया है। तीज त्यौहार को एक एक शब्द मे बारिश की बूंदों की तरह अलग ही सुकून और वास्तविकता से बड़े ही सुंदर तरीक़े से बयां किया है।

हरियाणा म्ह न्यू तो हर महीने म्ह कई त्यौहार आते रहवै सै पर सामण के त्यौहार तो घणा कसुता रँग चाव लेके आवै सै। इस महीने के शुरू होते ही घेवर, फिरणी ,पतासे अर कितने तरह की मिठाई बाजारों मे, बस स्टैंड पर स्टॉल मेँ सजाई जावें सै।

सामण महीने आते ही न्यारा ए नजारा दिखणा शुरू हो ज्या सै, जुकर किते मिठाई ते बाजार सज रहे हैं तो किते झूल, तो किते गुलगुले अर सुहाली की सुंगध, किते महिलाओं के गीत अर नई बहुओं के प्रेम की रीत…यो सामण घणा रंगीन

इस महीने में कोथली दी जाती है। कोथली यानि की मां द्वारा उसकी विवाहित बेटी को कपडे, सुहाग की चीजें , मिठाईयां भेजना। कोथली को माता से बहन के ससुराल तक भाई ही लेकर जाता है।हमारी बडी बडेरी महिलाएं बताती हैं की सावन महीने की शुरुआत होते ही उनको कोथली का इंतजार रहता था और मन में इच्छा भी रहती थी की….ईबकी बार मेरी मां मेरे ताई किसे रंग की चुंदडी भेजगी अर खाण ताई कितने गुलगुले सुहाली देवेगीं। अब कोथली में गुलगुले सुहाली की जगह बडे पतासे , घेवर और मिठाईयां दी जाती है। एक बेटी के प्रति एक मां के प्यार भाव दिखाती है ये कोथली…….मां बेटी के प्यार की पहचान बताती है ये कोथली…….भाई कितने ही बडे हो उम्र में ….परिवार में रसूक सिखाती है ये कोथली….

कोथली के सामान को सबसे पहले घर की बुजुर्ग महिला को सौंपा जाता है। उसमें से कुछ हिस्सा गौ माता के लिए , पितर देवताओं और ब्रहाम्ण देवता के लिए निकाला जाता है। इसके बाद कोथली में उपहार स्वरुप आई मिठाईयों, पतासों और घेवर को आस -पडोस में बांटा जाता है। कोथली जब भाई अपनी बहन के ससुराल देने जाता है तो वाकई वो लम्हा बेहद भावुक होता है। सावन का महीना केवल बूंदे ही नही बरसाता कुछ तो ऐसा भी देकर जाता है जिससे आंख भी बरस जाती हैं।

सावन के महीने में बागों में झूल डाल दी जाती हैं जिनको हरियाणवी में पींग कहा जाता है। नई बहुओं और छोरियो में पींग झूलने का चाव न्यारा ही होता है और ये चाव पूरा होता है ….तीज त्यौहार वाले दिन। इस दिन घरों में सुहाली, गुलगुले,पूडे और भी कई तरह के पकवान बनाएं जाते हैं।घर -कुनबे की सारी महिलाएं इकट्ठी होकर गीत गाती हुई पींग झूलने जाती हैं। पींग के एक ओर झूलाने के लिए छोटा सा रस्सा बांधा जाता है , जिसे लस्कर या लंगर कहते हैं।इस लस्कर(लंगर) को खींच कर ही झूला झूलाया जाता है। दादा लख्मीचंद की रागिनी में इस लम्हें का जिक्र कुछ यूं किया गया है…..
के मार चौकड़ी चढ़ी पींग पै
लत्ते चाल झड़ा के
दो छोरियाँ नै लंगर पकड़या
इधर उधर तै आकै

पिंग झूलते समय महिलाएं हँसी मख़ौल भरे गीत गाती हैं। ये समय उनके अल्हड़पन को आजादी से मनाने का होता है, जिसमें वो हँसी मजाक मे नृत्य , गीत और हास्य व्यंग्य से लेकर जेठ ,देवर की नकल भी करती हैं।
जैसे जैसे समय बदलता जा रहा है तीज भी हरियाली कम और मात्र तीज ही रह गयी है। सुहाली की मीठी डली ईब कित?
घेवर अर फ़ास्ट फूड बच गया अब , ये त्यौहार हमें हमारी परंपराओं से जोड़ने के सूत्र हैं जो अब टूटते जा रहे हैं।
इसके उदहारण आज ही देखने को मिलेंगे, ना घर कुनबे का मेल और ना तीज की झूल।
फेर भी किते किते तीज की झलक देखण नै मिलेगी…


अधिकतर जगह तीज फेस्टिवल से इस त्यौहार की रौनक देखी जा सकती है पर हरियाणा म्ह गाँव ही तीज ठेठ तरीके से मनाने का एकमात्र क्षेत्र कहा जा सकता है।
ये त्यौहार हमें कई सवाल पूछते नजर आते हैं, की आखिर त्यौहारों को भी मॉडर्न सोच ने मात्र मनुवादी आधार दे दिया है?
हर त्यौहार को मनाने के पीछे अगर हम जजमेंट करेंगे तो फिर क्या हमें नए त्यौहार बनाने की जरूरत है या फिर डे?
अपनी संस्कृति से जुड़ना हमारी मॉडर्न छवि को कमजोर नहि करता बल्कि वो सशक्तिकरण हमें मिलता है जो हमारे प्रदेश की माटी मे है।
गांव मे हो या शहर मे
बनाइये सुहाली गुलगुले
अर गाइयों मिलकर गीत
आप सबनै मुबारक हो हरियाली तीज

Load More Related Articles
Load More By Yuva Haryana
Load More In कला-संस्कृति

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

युवा हरियाणा टॉप न्यूज में पढ़िए आज की सभी छोटी बड़ी खबरें फटाफट

Yuva Haryana Top News, 13 july 2020 1. हरियाणा &…