रक्षाबंधन मनाए जाने के पीछे की ये 5 कहानियां, बहन की रक्षा के लिए भाई के संकल्प की गाथाएं

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रक्षाबंधन एवं सल्लूमण का पौराणिक एवं सांस्कृतिक महत्व

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सल्लूमण भारतीय संस्कृति का पवित्र त्योहार है। बहन भाई के प्रेम के प्रतीक इस त्योहार को रक्षाबंधन, सल्लूमण, रखी, सल्लूनो, सिल्लोनो, राखड़ी आदि के नाम से जाना जाता है। यह त्योहार गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक त्योहार भी है। यह दान के महत्त्व को प्रतिष्ठित करने वाला पावन त्योहार है।

रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। पौराणिक समय में श्रावण मास में ऋषिगण आश्रम में रहकर अध्ययन और यज्ञ करते थे। श्रावण-पूर्णिमा को मासिक यज्ञ की पूर्णाहुति होती थी। यज्ञ की समाप्ति पर यजमानों और शिष्यों को रक्षा-सूत्र बाँधने की प्रथा थी। इसलिए इसका नाम रक्षा-बंधन प्रचलित हुआ। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए ब्राह्मण आज भी अपने यजमानों को यज्ञ आदि विशेष आयोजनों के अवसर पर रक्षा-सूत्र बाँधते हैं। बाद में इसी रक्षा-सूत्र को राखी कहा जाने लगा ।

कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधते हुए ब्राह्मण निम्न मंत्र का उच्चारण करते हैं- येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वां प्रति बच्चामि, रक्षे! मा चल, मा चल।। अर्थात् रक्षा के जिस साधन (राखी) से अतिबली राक्षसराज बली को बाँधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तू भी अपने कर्त्व्यपथ से न डिगना अर्थात् इसकी सब प्रकार से रक्षा करना।


पौराणिक परम्परा के अनुसार सौ यज्ञ पूरे करने पर जब राजा बलि के मन में स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा बलवती हुई तो भगवान इन्द्र आदि देवताओं ने विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की। भगवान ने वामन अवतार के रूप में अवतरित होकर महाराजा बलि से तीन पग भूमि भिक्षा के रूप में मांग ली। वामन रूप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग, दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लिया। परिणामस्वरूप तीसरे पग के लिए जगह ही नहीं बची तो महाराजा बलि ने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया। भगवान ने तीसरा कदम उनके पैर पर रखा और वह पाताल लोक में पहुंच गया। भगवान विष्णु को उनका द्वारपाल बनना पड़ा। नारद जी के सुझाव पर लक्ष्मी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षा का बंधन बांधकर अपना भाई बनाया और उपहार स्वरूप उनके द्वारपाल के रूप में कार्य कर रहे भगवान विष्णु एवं अपने पति को अपने साथ ले आई। यह दिन सावन मास की पूर्णिमा का दिन था। इसी दिन से रक्षाबंधन मनाने की परम्परा शुरू हुई।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार जब देवों और दानवों में युद्ध हुआ तो देवता हारने लगे। ऐसी स्थिति में देवता इन्द्र के पास पहुंचे। देवताओं को भयभीत देखकर इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी एवं महारानी शचि ने उनके हाथों पर रक्षा का सूत्र बांध दिया। तत्पश्चात देवताओं की विजय हुई। यह दिन भी सावन की पूर्णिमा का ही दिन था।

महाभारत काल में द्रोपदी द्वारा श्रीकृष्ण को राखी बांधने का वृतांत मिलता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रोपदी ने उसी समय अपनी साड़ी फाडक़र उनकी ऊंगली पर कपड़ा बांध दिया। वह दिन भी सावन मास की पूर्णिमा का ही दिन था। भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपदी के चीरहरण के समय उनकी लाज बचाकर उनकी रक्षा की।

एक अन्य प्रमाण के अनुसार अलेक्जेंडऱ जब भारत में आया तो राजा पुरु के साथ उनका युद्ध हुआ। ऐसे में अलेक्जेंडऱ की पत्नी ने अपने पति की रक्षा के लिए राजा पुरु को राखी भेजी। युद्ध समाप्त हुआ और राजा पुरु ने अलेक्जेंडऱ की पत्नी को अपनी बहन मान लिया।

इसी प्रकार चित्तौड़ की राजमाता कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमांयू को राखी भेजकर अपना भाई बनाया। संकट के समय बहन कर्णावती की रक्षा के लिए हुमांयू अपनी सेना सहित वहां पहुंचा और मेवाड़ की रक्षा की।

इस प्रकार पौराणिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से रक्षाबंधन को मनाने के अनेक प्रमाण हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बहन-भाई के प्रेम का प्रतीक यह त्योहार वास्तव में भारतीय संस्कृति का ऐसा त्योहार है जिसमें सांस्कृतिक परम्पराओं का समावेश भाई-बहन के प्रेम के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। लोकजीवन में भाई बहन के घर रक्षाबंधन के दिन राखी बंधवाने के लिए जाता है। इसके ठीक विपरीत विवाहित बहनें अपने भाईयों को राखी बांधने के लिए अपने मायके भी आती हैं। राखी बांधने के बदले भाई की ओर से बहन को अनेक उपहार दिए जाते हैं।

वास्तव में राखी का त्योहार भावनात्मक रूप से मन के पवित्र भावों के साथा भाई की कलाई पर प्रेम की ड़ोर का रक्षा सूत्र है। वर्तमान में यह त्योहार आधुनिकता का रूप धारण कर चुका है।

बहन भाई की एकता के प्रतीक इस त्योहार पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

– डॉ महासिंह पूनिया, क्यूरेटर, धरोहर हरियाणा संग्रहालय