अंधविश्वास में पढ़े लिखे भी खो रहे अपनी जिंदगी, पढ़िये अंधविश्वास की कहानी

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Anshula Garg, Kurukshetra

अंधविश्वास किस हद तक आम लोगों की जिंदगी से जुड़ा है और कैसे लोगों के अंदर डर पैदा करता है, ये हर कोई जानता है। अंधविश्वास की ही तो बात है कि कहीं भगवान बीमार हो रहे हैं, तो कहीं तांत्रिक विद्या के लिए बलि चढाई जा रही है।

भगवान जगन्नाथ भी बीमार हो गए थे, अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक उनके लिए डॉक्टर बुलाए गए। भगतों के लिए दर्शन भी बंद कर दिये गए।

आपको अंधविश्वास की पूरी कहानी बताते हैं…

शाब्दिक अर्थ में अंधविश्वास मनुष्य द्वारा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अज्ञानवंश किसी भी व्यक्ति-वस्तु पर आंख मूंदकर अडिग विश्वास करना कहा जा सकता है। जब उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि ऐसा करने से उसका व उसके अपनों का नुकसान हो रहा है और उसे मौत की राह पर ले जा रहा है। यह वही है जो उसकी सही-गलत की सोच ही खत्म कर देता है और मनुष्य अधोगति के रास्ते पर चल पड़ता है।

यह बात और भी मन को दुखी करती है जब समाज व राष्ट्र को दिशा देने वाला शिक्षित वर्ग ही अंधविश्वास के जाल में फंसकर न जाने क्या-क्या कुकृत्य कर डालता है। यहां तक कि खुद को मौत के चंगुल में झोंक देते हैं और वह भी महज अपनी या अपने किसी करीबी की खुशी के लिए व धन की वृद्धि के लिए !

ऐसा ही एक वाकया अभी दिल्ली के बुराड़ी में देखने को मिला, जहां 11 लोगों ने अंधविश्वास में फंसकर खुदकुशी कर ली। जांच बताती हैं ऐसा उन्होंने किसी एक आत्मा को खुश करने के लिए किया, पर असलियत में ऐसा करके उन्हें मौत के सिवाए क्या मिला ? ऐसे ही राजस्थान व महाराष्ट्र के अन्य उदाहरण भी हैं जहां परिवार के किसी सदस्य ने अंधविश्वास के कारण अपने ही परिवार को मौत के घाट उतार दिया या फिर पूरे परिवार ने सायनाइड खाकर आत्महत्या कर ली। यह सोचनीय है कि इस तरह के कार्य करके ये लोग समाज को किस दिशा की ओर ले जाना चाहते हैं।

कहा जाता है हमारा देश बाबाओं का देश है। लेकिन उनमें से अनगिनत ढोंगी बाबा भी खुद को स्थापित किए हुए हैं, जो भोले भाले लोगों को धन, विद्या, बीमारी के ठीक होने, मृत्यु दोष दूर करने, सौतन से छुटकारा पाने, संतान व बेटे की प्राप्ति आदि अनेक लालच देकर ना जाने क्या क्या कर्मकांड व टोने-टोटके करवाते हैं। ऐसे कार्यों से दूसरों का तो नुकसान होता ही है, साथ ही हम लोग खुद का भी नुकसान कर बैठते हैं और इन ढोंगी बाबाओं का व्यापार चलता रहता है।

इनके यहां हर छोटे से छोटा व बड़े से बड़ा आदमी बैठा मिल जाएगा। लालच के अंधकार में उन्हें अच्छा-बुरा कुछ नजर नहीं आता। होली-दिवाली, अमावस्या-पूर्णिमा की रात को पता नहीं कितने ही चौराहों पर कहीं न कहीं कुछ-कुछ रखा हुआ मिल जाएगा। पश्चिम बंगाल में कामाख्या देवी पर तो जीव बलि ही दी जाती है। इसके अलावा हर शहर में पेड़ के नीचे तंबू गाड़े इन जन्त्र-मंत्र वाले बाबाओं के खोखचे मिल जाएंगे।

सामान्य तौर पर हमारे देश में बहुत तरह के अंधविश्वास फैले हुए हैं। ये न केवल अभी जागृत हुए हैं बल्कि इनकी जड़े प्राचीन काल से स्थापित हैं। बिल्ली रास्ता काट गई, किसी काम की शुरुआत करते समय छींक आना, सूर्यग्रहण-चंद्रग्रहण में बाहर जाना, मंगलवार को बाल काटना, सांय के समय सफाई करना आदि अनेक कार्य हमारे समाज में अशुभ माने जाते हैं। लेकिन इनके मूल कारणों को जाने बिना ही हम सभी किसी भी भेड़ चाल का हिस्सा बन जाते हैं। हमें जरूरत है उसके पीछे छिपे कारणों को जानने की।

अंधविश्वासपूर्ण मान्यताओं की जड़े केवल अशिक्षित वर्ग में ही नहीं बल्कि शिक्षित वर्ग में भी फैली हुई हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हरवंश मुखिया का कहना है कि “यह एक भ्रामक विचार है कि शिक्षित वर्ग अधिक विवेकपूर्ण व तर्कसंगत होता है व अशिक्षित वर्ग अंधविश्वास में अधिक यकीन रखता है। अंधविश्वास प्रत्येक देश व समाज में है।” अंधविश्वास विकासशील देश ही नहीं अपितु विकसित देशों में भी य‍ह देखने को मिल जाएगा। विकसित देशों में जनसमूह 13 अंक को अशुभ मानते हैं, वहां कहीं भी 13 नंबर का मकान, गली, मोहल्ला, फ्लैट, फ्लोर नहीं मिलेगा, यहां तक कि वे 13 के योग में किसी कार्य का होना बहुत अधिक अशुभ मानते हैं। ऐसे विचारों का बहुत से लोगों ने समर्थन किया है। हमारे हरियाणा और पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में भी तो सेक्टर-13 नहीं है। जिस शहर का विकास आधुनिकता और तकनीक के आधार पर किया गया हो, उसके डिजाइन में ऐसे अंधविश्वास को स्थान देना दिखाता है कि अवैज्ञानिक मान्यताओं की जड़ें शिक्षा, सभ्यता के दायरों के बाहर-भीतर, दाएं-बाएं हर जगह फैली हुई हैं।

अंधविश्वास दरअसल व्यक्ति के डर, लालच, लोभ और पुश्तैनी मान्यता के कारण जन्म लेता है। इसमें मनुष्य का डर सबसे प्रमुख है। उसके मन मस्तिष्क में बहुत प्रकार के डर जगह बनाए हुए हैं। कभी परीक्षा में फेल होने का डर, बीमार होने का डर, नौकरी न मिलने का डर, मरने का डर; जिस कारण मनुष्य कमजोर पड़ जाता है और वह उपाय ढूंढने लगता है। यदि वह सन्मार्ग पकड़े ले, उसका जीवन शांति से भरपूर हो जाता है पर यदि गलत रास्ते पर भटक गया तो उसका अंत उसे अंधविश्वासी बना देता है और वह झाड़-फूंक, टोने-टोटके वाले बाबाओं के वश में आ जाता है। वह तर्कहीन, निराधार, असंगत, दकियानूसी मान्यताओं पर यकीन करने लगता है और कई बार खुद का ही नुकसान कर बैठता है।


विज्ञान भी कहता है कि हर कार्य व मान्यता के पीछे वैज्ञानिक कारण होते हैं। हमें उन्हें मानने नहीं जानने की जरूरत है। महात्मा बुद्ध का कथन है कि संसार की हर वस्तु पर विश्वास करने से पहले उसे प्रमाणित, अनुमानित व सुविचारित किया जाना चाहिए। धार्मिक निष्ठा व अंधविश्वास में बहुत अंतर है धार्मिक निष्ठा का होना सकारात्मकता को बल देता है परन्तु अंधविश्वास नकारात्मकता की ओर ले जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि अच्छी व बुरी वस्तुओं में भेद कर सकें व खुद को कुमार्ग पर जाने से बचा सकेंगे नहीं तो अंत दिल्ली के बुराड़ी कांड जैसा भी हो सकता है।


मध्ययुग में साहसी व महान संत कबीर ने अपने दोहों के माध्यम से लोगों में ऐसी अनेक कुरीतियों रूढ़ियों के प्रति जनजागृती लाई थी। उन्होंने व्यर्थ रूढ़ियों, लोकाचारों और क्षुद्र विचारों का न सिर्फ विरोध किया अपितु व्यंग्य की धार से भी काटा। उदात भविष्य के महानायक कबीर जी ने हिंदू और मुसलमान के अंधविश्वास की साथ ही खिल्ली भी उड़ाई। ऐसे ही वे अपने एक दोहे के माध्यम से कहते हैं –
“मूरति धरि धंधा रखा, पाहन का जगदीश।
मोल लिया बौलै नहीं, खोटा विसवा बीस।।”
अर्थात लोग ईश्वर की मूर्ति को खरीदकर, उसे भगवान कहकर उसका धंधा करते हैं व लोगों से पैसा एँठते हैं। जिस ईश्वर की मूरत को वो मोल लेते हैं उसे खुद कुछ नहीं मिलता लेकिन उसके नाम पर एक निठल्ला व्यक्ति महान बन जाता है।

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