आज फिर याद आ गई मुझे मेरे गांव की तीज…

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@ महासिंह पूनियां

तीज की हार्दिक शुभकामनाएं….
आज फिर याद आ गई मुझे मेरे गांव की तीज…

सामण का महीना लगते ही गांव में जिस तरह के रुनक-झुनक देखने को मिलती थी आज वह फिर से ताजा हो उठी। छोटे-छोटे बच्चे तीज से पहले ही बैठकों एवं पेड़ों में झूले ड़ाल लेते थे और गीत गाते थे मेरी पींघ तलै लांडा मोर नाच्चै..। इसके साथ ही गांव में महिलाएं अपना काम-काज निपटाकर रात को गीत गाते हुए झूले झूलती थी।

उनके गीतों से पनपी स्वर लहरियां आज भी कानों में गूंज रही हैं। महिलाओं में एक दूसरे से ऊपर पींघ ले जाने की होड़, सासू का नाक तोडऩा जैसी घटनाएं झूला झूलती महिलाओं की उमंग के प्रतीक के रूप में आज फिर से मानस पटल पर अंकुरिम हो उठी हैं। सामण के महीने झड़ी एवं बूंदाबांदी के बीच में घर में चुल्हे पर मिट्ठी रोटी पकाना, सुहाली, गुलगुलों एवं पूड़ों की महक से पूरी गली सरोबार हो उठती थी। हम सभी बच्चे अकसर ये गीत गाया करते थे ताते-ताते पूड़े कर दे री मां, हाथ जलै मूंह मीट्ठा री मां..।

अचार के साथ पूड़ों का स्वाद ही कुछ और है। तीज से पहले गांव के गोरे पर लगे पेड़ों पर टहने रोकने की परम्परा ग्रामीण आंचल की ऐसी घटना हुआ करती थी जिससे युवाओं में जोश एवं उमंग का भाव देखने को मिलता था। साथ ही तीज के दिन छोटे बच्चे सुबह से ही अपने नेज्जू एवं पाटड़ी लेकर यथा स्थान पर पहुंच जाते थे। उधर भाभियों को झुलाने के लिए युवाओं की मंडली भी पंझाली ड़ालने के काम में जुट जाया करती थी। इस प्रकार दोपहर के समय महिलाओं के गीत गाते हुए समूह झूलने के लिए आया करते थे।

महिलाओं का सज-धज कर झूलने के लिए जाना वास्तव में ग्रामीण संस्कृति का ऐसा सौन्दर्य रहा है संभवत आज भी है कि इस दृश्य को देखने मात्र से ही ग्रामीण संस्कृति की आभा पर गौरवानुभूति होती है। और फिर देवरों द्वारा भाभियों को झुलाने की परम्परा का सिलसिला इस उमंग से शुरू होता था जो शाम होने तक चलता था। इसके साथ वहां पर बैठ बुजुर्ग, महिलाएं सभी जन आनन्द का ऐसा वातावरण पैदा करते थे जिसकी ग्रामीण खुशबू आज भी भावों को रोमांचित कर देती है।

पाटड़े एवं पंझाली पर झुलाते हुए देवरों एवं भाभियों का ऐसा मुकाबला जिसमें मजाक भी होता था और जीतने की जिद भी। अनेक भाभियों की आवाज झूले की उंचाई पर जाते हुए गीत गाते-गाते कम्पन पैदा होने पर देवरों को जिस आनन्द की अनुभूति होती थी वह वास्तव में किसी ब्रह्मबुटी से कम नहीं था। इसके पश्चात तो देवरों द्वारा और हांग भरना झूलों को और अधिक ऊंचाई तक ले जाना भाभियों के गीतों में डऱ से कम्पन पैदा करने की होड़ वास्तव में जीत का ऐसा अहसास था जिसका जिक्र साल भर चलता था। एक बार जब पाटड़ा ड़ला हुआ था। देवर-भाभियों को झुला रहे थे। झूला अपने यौवन पर था।

ऐसे में रस्सा टूट गया और उसके पश्चात जो दृश्य पैदा हुआ वह वास्तव में किसी अद्वितीय रोमांच से कम नहीं था। भगवान की दया से किसी को ज्यादा चोट नहीं आई लेकिन उस दृश्य का बिम्ब आज भी मन-मस्तिष्क में उभरता है तो रोएं खड़े हो जाते हैं। इस प्रकार सुबह से लेकर शाम तक झूलों की जो बयार आती थी उसी की प्रेरणा है के हम आज फिर से तीज का त्योहार मना रहे हैं।

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