Home कला-संस्कृति कोथली में सजकर आता जरा सा मायका, सावन की तीज का नजारा न्यारा था

कोथली में सजकर आता जरा सा मायका, सावन की तीज का नजारा न्यारा था

0
0Shares

Yuva Haryana News
@ सुनीता करोथवाल

कोथली में सजकर आता जरा सा मायका
हाँ, माँ सावन में हर साल भेजती है कोथली में बाँध कर जरा सा सावन। घेवर, कपड़े, चूड़ी, मेहँदी, सुहाली, हथेली जितने बड़े पताशे, कसार और गाँव से आती जरा सी भीगी महक।

यूँ तो भाई की सूरत देख हर बहन सावन हो जाती है। पर मायके की गली का सावन कभी भूल ही नहीं पाती। सावन के आते ही मन की रस्सियाँ पीहर के बागों में पींग डालती हैं। वे मोर, कोयल की आवाजें, कौओं के नीम के ऊपर पहरे, सहेलियों की टोली, प्लास्टिक के सप्रिंग वाली चूड़ियाँ, नन्ही हथेली पर मेहँदी की चित्रकारी, कंधे पर रस्सी और हाथ में सीढ़ी के नजारे याद करती हैं सावन की तीज सिर्फ छुट्टी का दिन नहीं था। बहुत बड़ा त्योहार था।

बाबुल तुम्हारे गाँव में मेरे नीम, कीकर, झूले छूट गए। वे साँप की छतरियाँ और खुम्भी की खूबसूरती छूट गयी। बारिश में उगे मुट्ठी में बंद जरा मिट्टी में दबाए हुए नीम के नन्हे बच्चे छूट गए। आम की दबायी गुठलियों के उग आने का उतावलापन छूट गया। बारिश के बाद कीचड़ में जानबूझकर पैर गंदे करना छूट गया। तुम कोथली के साथ सब भिजवा देना।

मुझे बहुत याद आता है, वह गली के गड्ढों में भरा हुआ पानी और नंगे पैरों का उछलना, कड़कती बिजली और आँगन में बहाने बनाकर जाना, जानबूझकर फिसलना। माँ बाबा की आवाजें अभी भी कानों में गूंजती हैं। “बारिश में मत नहा, बीमार हो जाएगी।” पर बारिश बुरी नहीं लगती थी। कच्चे घर की टपकती छत्त भी यूँ लगती जैसे घर में कोई नयी खुशी फूट पड़ी है। पूरी गली में चप्पल हाथ में लेकर चलना शान की बात लगती । बारिश के बाद पेड़ों को हिलाना तो सबसे पसंदीदा काम होता। दूसरे के ऊपर डाली हिलाना, उसे गीला करके भागना तो ओर भी मजेदार लगता।

एक सुनहरी लड़की मायके जाना चाहती है। चलो! सब चलते हैं। अपने पीपल के पेड़ और जोहड़ के किनारों पर।
जोहड़ के किनारे वाले पीपल पर सावन गाते हुए झूलेंगे। झूलते- झूलते जोहड़ में गोता लगाएँगे। कीकर की कच्ची कोपल फूट चुकी होंगी। नीम निम्बोलियों से झुक गए होंगे। बस हमारी ही तो कमी है। आधे पेड़ तो कट चुके होंगे। फिर भी जाने का मन तो है ही।

जैसे घर की रोटी रिटायर होने के दौर में है, वैसे ही तीज का त्योहार चलन से बाहर है। पर मेरा मन नहीं मानता कि मैं छत्त पर खड़े लोहे के झूले पर शगुन सा झूल लूं। मुझे तो बाड़े भीतर खड़े नीम की गोदी में झूलना है। पेड़ पर चढ़ कर कौवे की चोंच से डर कर झूला डालना है। उस मोटी कीकर पर झूल डालनी है जिसकी झूल की रस्सी मेरी हथेली में नहीं समाती। जिसकी ऊँचाई मुझे तारों को पैर का अंगूठा लगाने से जरा सी दूर लगती है।

मैं झूलती रहूँ और बारिश मुझ पर मोतियों सी बरसती रहे। गली में ठहरा पानी मुझे आवाज दे कि गोरी पगथलियों से हमें छपाकों में बाँट दो। फिसलती मिट्टी मेरे पैरों को बढ़ने ही न दे। मेरा एक पैर खींचकर कुरते पर नया डिजाइन बना दे। निम्बोलियाँ मुझसे कहें कि हमें चख कर अपना मुँह बिचका लो और गुठलियों को अपनी सहेलियों पर फेंक दो। बारिश मुझे कहे ,भीतर मत रह गली के बच्चे बरसाती पतनाल के नीचे बाल्टी भर रहे हैं, तुम भी भर लो। सुबह होते ही सहेलियाँ मुझे आवाज दें, “आ जा झूल डालनी है।” मैं जिद्द करूँ कि पहले मुझे ही झूलना है।

कीड़ी भी मुझे ही झुलानी है। पेड़ पर चढ़कर काट वाला पत्ता भी मुझे ही लगाना है। मुझे तब तक झूलना है, जब तक सहेली अपनी रस्सी न माँगने लग जाए। मुझे तब तक झूलना है, जब सारी सहेलियाँ कह कह कर दूर थक जाएँ और कहें कि हम घर जा रही हैं। मुझे तब घर लौटना है जब पेड़ों के सोने का वक्त हो जाए और घरों से कढाही में खोलती सुहालियों की खुशबू न आने लगे।

Load More Related Articles
Load More By Yuva Haryana
Load More In कला-संस्कृति

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

हरियाणा में आज कोरोना के 103 नये पॉजिटिव केस, देखिये मोर्निंग मेडिकल बुलेटिन

Umang Sheoran, Yuva Haryana, Panchkula हरियाणा &…