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आज वो पेड़ रहे ना पींघ, तीज के भी दिन होए पुराने

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Yuva Haryana News

@ सुरेंद्र दहिया

तीज उत्तर भारत और खासकर हरियाणा का एक विशेष त्यौहार है। यह त्यौहार विशुद्ध रूप से प्रकृति और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। अन्य त्यौहार में कुछ ना कुछ धर्म का अंश मिला होता है। जब वर्षा से सारी धरा सरोबार होती है चारों और हरियाली की छटा होती है तो मानव मन भी मयूर की तरह हर्षित हो कर नृत्य को आतुर होता है। देखा जाए तो त्यौहार की शुरुआत सी हो जाती है तीज से और होली पर खत्म। इसीलिए कहा भी जाता है

आयी तीज बिखरेगी बीज
आयी होली भर ले गयी झोली।

हरियाणा में तीज विशेष रूप से मनाया जाता रहा है। इस त्यौहार पर बहन बेटियों के पास “कोथली” जरूर भेजी जाती है। यह परंपरा कालांतर से चली आरही है। पहले कोथली में घर के बने मीठे पकवान और बहन बेटी के लिए कपड़े लत्ते भेजे जाते थे। मीठे पकवानों में सुहाली, गुलगुले, मीठी मट्ठी आदि होती थी। लोकगीत में भी कहा जाता था

मीठी तै करदे री मां कोथली जाना बहन के देण
पपहिया री बोल्या पिपली

समय से साथ कोथली भी बदलती गयी। घर के बने मीठे पकवानों का स्थान घेवर, पातसे ने ले लिया। बहन बेटी बड़ी शिद्दत से इंतजार करती थी कि कब कोथली आएगी उसकी। माँ बाप भाई भाभियों की भी यही इच्छा रहती थी कि कोथली जरूर पहुचाई जाए।

अगर किन्ही मजबूरी वस कोथली नहीं पहुँच पाती तो बहन बेटी को बहुत ही बुरा लगता था और इस बात की भी टुकाई हो जाती थी कि फलानी की कोथली नहीं आयी।

ये कोथली सिर्फ खानपान की चीजें या लत्ते कपड़े ना होकर एक प्रेम और सम्मान का सूचक होता था बहन बेटी के लिए। चाहे लड़की कितने ही बड़े पद पर हो किसी चीज की कमी नही हो वो भी इंतज़ार में रहती है कोथली की। कोथली में मायके का जो प्यार और दुलार आता है उसका कोई मुकाबला नहीं।

आज भी चाहे आदमी कितना भी गरीब हो उसकी कोशिश होती है कि अपनी हैसियत के हिसाब से बहन बेटी की कोथली जरूर पहुचाई जाए।
वैसे तो पुरे सावन के महीने में झूला झूला जाता रहा है लेकिन तीज को खुलने का अलग ही उत्साह और उमंग होती है। सुबह से ही गाँव के बाहर बड़, पीपल, नीम, कीकर आदि के बड़े बड़े पेड़ो पर झूल डाल दी जाती थी। लडकिया, बहुवें सब नए कपड़े पहन कर गीत गाती हुई झूलने को जाती थी। नई आयी हुई बहु विशेष आकर्षण होती थी उस दिन। चारो और झूल ही झूल होती थी। उसी का वर्णन सूर्यकवि लख्मी चंद ने एक रागनी में किया है

चौगरदे के बाग हरा घन घोर घटा सामाण की
छोरी गावै गीत सुरीले झूल घली कामण की

झूलते हुए गीत गाती रहती थी।पींघ इधर से उधर और ऊंचे से ऊंचे होती रहती थी। जब तक हाथ बढ़ा कर पेड़ की टहनियों से पत्ते ना तोड़ लेती तब तक लगता ही नही था कि झूली भी हैं। इस पेड़ से पत्ते तोड़ने वाली बात को “सासु का नाक तोड़ना” का नाम दिया जाता था।
देवर भी अपनी भाभियों को झुलाने को आतुर रहते थे। भाभी पींघ पर और देवर के हाथ मे लश्कर। दोनो में जिद। देवर की ये जिद की भाभी को पींघ पर चक्कर आने लगे और वो पींघ को रोकने की कहे। भाभी को ये जिद की देवर ही हार मान कर पींघ को रोक दे। हार मानने को कोई भी तैयार नहीं। इसी तरह कई गीत गा लेती औरतें पींघ पर झूलते झूलते। देवर भी थकावट महसूस करने लग जाता है। भाभी को भी पींघ पर बैठे बैठे चक्कर आने लगते हैं। भाभी को पता है देवर की हालत का और यह भी जानती है कि वो हार नहीं मानेगा। आखिर में भाभी ही अपना बड़प्पन दिखाती है और कहती है देवर रोक दे पींघ ने घिरणी चढ़ण लागगी।
इसी प्यार और शर्म से पूरा दिन लोग लुगाई झूलते रहते थे।

आज ना वो पेड़ रहे ना वो पींघ

 

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