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सावण में आई तीज की याद, बखत वो था झूल घालण का…

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Yuva Haryana News
@डॉ. सुलक्षणा

देहलियाँ के म्हा बैठी वा ताई न्यू सोचै थी मन म्ह,
इब सामण बीत ज्या स पर झूल घलती ना बण म्ह।

एक बखत वो था महीने पहल्यां झूल घल जाया करती,
तीजां कै धोरै झूल घालन नै किते ना ठोड़ पाया करती,
कोड़ ब नंबर आवै न्यू छोरी, बहु खड़ी लखाया करती,
लांबा हाथ बढ़ा कै सासु जी का नाक तोड़ लाया करती,
लंगर पकड़ कै झूल नै पल म्ह चढ़ा दिया करते गगन म्ह।

सारी लुगाइयाँ कै चाह चढ़ जाता कोथली आवण का,
कोथली म्ह माँ के दिये दो चार नये सूट सिमावण का,
पहल्यां पीहर तै आई मिठाई घर घर म्ह बंटवावण का,
फेर घर कै बड़ां नै दे कै मौका लाग्दा हामनै खावण का,
जद दे कै कोथली भाई चाल्दा बाकी ना रहती तन म्ह।

तिलां म्ह एक बढ़िया सूट माँ सासु का भेज्या करती,
आपणै हाथां बना कै मट्ठी, सुहाली वा भेज्या करती,
कदे बाँटन म्ह कम ना रहज्या अबल सा भेज्या करती,
मान तान क्यूकर देनी स भाई नै समझा भेज्या करती।
समझा आइये बेबे नै पाछै ना हटै सासु की सेवा करण म्ह।

आज तै कोथली का यू रिवाज कती बंद होता जावै स,
बस सेर दो सेर घेवर अर एक सूट कोथली म्ह आवै स,
छोरा बहु के आगै भला कित माँ बाप की पार बसावै स,
ताई के मन की सारी या “सुलक्षणा” खोल कै बतावै स,
बार त्यौहार प छोरी नै देते कोणी, लाई आग लागै धन म्ह।

 

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