गूंगा पहलवान ने कई इंटरनेशनल पदक जीते लेकिन दुर्भाग्य से मंदबुद्धि घोषित कर कुछ नहीं दिया

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Sahab Ram, Yuva Haryana

Chandigarh, 02 June, 2018

हरियाणा के गूंगा पहलवान के नाम से मशहूर विरेंद्र सिंह हरियाणा के सासरौली गांव के हैं। वो 74 किलो भार वर्ग के फ्री स्टाइल पहलवान हैं जो तीन बार डीफॉओलपिंक में गोल्ड मेडल वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में सिल्वर और ब्रांज मेडल जीत चुके हैं।

गोल्ड मेडल जीतने वाले खिलाड़ी के हर तरफ चर्चे हैं, साल 2002 में ही उन्होने नेशनल कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता था।

लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि वो बोल नहीं सकते थे, तो जो पहलवान दूसरे नंबर पर आया था उसके अगले मुकाबले के लिए भेजा गया था।

जानकारी के मुताबिक गूंगा पहलवान ने सात अंतरराष्ट्रीक पदक जीते हैं।

1924 से केंद्र सरकार के नियमों के मुताबिक पैरालंपिक खेल और डीफोलंपिक खेल एक ही श्रेणी में थे, पर दोबारा नियमों में बदलाव किया गया और इस खिलाड़ी को मंदबुद्धि खिलाड़ी की श्रेणी में शामिल कर दिया गया।

दुर्भाग्य की यह बात भी है कि वीरेंद्र को अन्य विजेता खिलाड़ियों की तरह ना तो कभी इनामी राशि दी गई और ना ही नौकरी दी गई ।

हुड्डा सरकार के दौरान इस खिलाड़ी की थोड़ी कद्र हुई और उन्हे जूनियर कोच की नौकरी मिली। करीब 13 सालों से कुश्ती खेलकर और अनेकों मेडल जीतने के बाद भी अगर उनके घर के हालात देखे तो दयनीय हैं।

उनके पास किसी प्रकार की कोई सुख सुविधा नहीं है।

हालांकि खट्टर सरकार ने वीरेंद्र पहलवान को छह करोड़ रुपये की ईनामी राशि देने की घोषणा की थी लेकिन तीन साल के इंतजार के बाद भी कुछ नहीं मिला।

अब बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार के नियमों में बदलाव के चलते उन्हे मंदबुद्धि की श्रेणी में डाल दिया गया और छह करोड़ की राशि में कटौती होकर सिर्फ एक करोड़ रुपये की बच गई। लेकिन अब भी दुर्भाग्य की बात यह है कि यह राशि भी इनको नहीं मिल पा रही है।

एक बात और भी सामने आई है कि विरेद्र सिंह को साल 2016 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया था लेकिन क्या इतने इंटरनेशनल पदक जीतने के बाद वो खेल रत्न पाने के हकदार नहीं थे।

 

 

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