तेल के दाम बढ़ाने में सरकार खेल रही चालाकी, तेल कंपनियों को जनता की जेब काटने की खुली छूट

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Sahab Ram, Yuva Haryana
Chandigarh, 22 May, 2018

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सरकार के तेल कंपनियों से आग्रह कर 24 अप्रैल से तेल के दामों में होने वाली निरंतर बढ़ोत्तरी को रोक दिया था, लेकिन जैसे ही कर्नाटक के चुनाव हुए, उसे अगले ही दिन तेल के दामों में आग लगनी शुरु हो गई।

तेल की कीमतों का आकंड़ा देखा जाए तो करीब 19 दिनों तक तेल के दामों में एक पैसे की भी बढ़ोत्तरी नहीं हुए, लेकिन अब पिछले कई दिनों से रोजाना तेल के दाम बढ़ रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के दामों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है जिस वजह से तेल कंपनियां लगातार तेल के दामों में बढोत्तरी कर रही है, इतना ही नहीं तेल कंपनियां खुद के मार्जन को लेकर भी रोना रो रही है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान 19  दिनों तक तेल के दामों में बदलाव नहीं किया गया था, जिसके चलते तेल कंपनियों का मार्जन 2 रुपये 70 पैसे घटकर सिर्फ 50 पैसे तक आ गया था, यही वजह है कि अब तेल कंपनियां लगातार आम जनता की जेब से तेल के दामों के रेट बढाकर पैसे निकाल रही है।

जिस प्रकार से तेल कंपनियां अपना मार्जन पूरा करने के लिए रोजाना तेल के दामों में बढ़ोत्तरी कर रही है, उसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक महीने बाद ही तेल के दाम 100 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाएंगे।

तेल कंपनियां अपना मार्जन पूरा करने के लिए अब जनता की चमड़ी उधेड़ने में जुटी हुई है तो सरकार भी चुप्पी से जनता को कराहते हुए देख रही है, एक्शन कुछ भी नहीं लिया जा रहा है।

प्रतिदिन के बढ़ते दामों की देखिये ये रिपोर्ट

तारीख बढोत्तरी (प्रति लीटर)
14 मई 17 पैसे
15 मई 15 पैसे
16 मई 15 पैसे
17 मई 22 पैसे
18 मई 29 पैसे
19 मई 30 पैसे
20 मई 33 पैसे
21 मई 33 पैसे
22 मई 30 पैसे

इस प्रकार से देखिये लगातार 14 मई के बाद से तेल के दामों में बढ़ोत्तरी हो रही है, इसका मतलब सीधा और साफ है कि चुनाव के वक्त दिखावे के लिए तेल के दामों पर रोक लगाई गई लेकिन जैसे ही चुनाव हुए उसके बाद फिर से लोगों की जेब काटने के लिए तेल कंपनियों को खुली छूट दे दी।

मौजूदा हालात में जिस प्रकार से तेल के दाम बढ़ रहे हैं ये तेल के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं, हालांकि यूपीए सरकार के दौरान एनडीए के नेता तेल की कीमतों को लेकर सरकार को कोसते थे, लेकिन आज उन्ही नेताओं ने अब चुप्पी साध ली है।

इधर तेल कंपनियों को रोजाना तेल के दामों में बदलाव करने की खुली छूट देने की पॉलिसी ने आम आदमी की निगाहों में बचने की तो भरपूर कोशिश की थी, पहले महीने या तीन महीने पर तेल के रेट बढ़ते थे, वो भी दो या चार रुपये प्रति लीटर, लेकिन अब जो रोजाना बढ़ रहे हैं, उनका जनता भी हिसाब नहीं लगा पाती है, इसका मतलब जनता के साथ चालाकी खेली जा रही है।

तेल कंपनियों अपना घाटा पूरा करने के लिए आम आदमी की जेब काट रही है, और इस मंदम-मंदम तरीके से सरकार भी पिछली खिड़की से मुंह छुपाकर आम लोगों की जेब पर डाका मारने की खुली छूट दे चुकी है। तेल के दामों में रोजाना बदलाव से जनता को उम्मीद जगी थी कि तेल के दामों में रोजाना के हिसाब से अगर होगा तो कुछ कटौती होगी, लेकिन यह जनता पर ही उल्टा पड़ गया।

 

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