Home कला-संस्कृति रांझा और किसान के प्यार के अंतर को समझाती यह कविता “तू रांझा मैं हाली”

रांझा और किसान के प्यार के अंतर को समझाती यह कविता “तू रांझा मैं हाली”

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Deep Jangra,

Chandigarh, 13 Feb,2019

****तू रांझा मैं हाली****

मैं इश्क़ करणिया रांझा कोन्या, हां भैंसा का पाली हूँ
मेरी हीर सै धरती मेरी रै, मैं तो खेतां का हाली हूँ।

मैं खेत कमाणा चाहूँ सूँ, ना प्यार करण की होड़ मनै,
मेरी वफ़ा ज़मीन निभाये जा, ना पड़ै मरण की लोड़ मनै,
मनै सींच्या आप जो बीज मरण नै, मैं उसे पेड़ की ढाली हूँ
मैं इश्क़ करणिया रांझा कोन्या, हां भैंसा का पाली हूँ।

तेरा अखन काणा बैरी था, जो ब्याह कै लग्या हीर तेरी
मेरी आमद देख कै रुठै सै, हर छटे महीने बीर मेरी
एक छिमाही मैं रोशन होवै रै, मैं वाहे रात काली हूँ
मैं इश्क़ करणिया रांझा कोन्या, हां भैंसा का पाली हूँ।

तू तो रांझे चुरी खा गया, तेरी हीर कूट कै खवाया करती
सुक्खे बासी टीकड रांझे मेरे बालकां की माँ ल्याया करती
जो गरम बणा दे सरकारां नै, मैं रांझे वाहे पराली हूँ
मैं इश्क़ करणिया रांझा कोन्या, हां भैंसा का पाली हूँ।

इतिहास बणा गया तू तो रै, मै ढुंड नी एक बणा सकता
तेरा दुख भी एक सै हीर गई मैं, दुख भी तो ना गणा सकता
हर दुख नै झार कै सुख टोहवूं, मैं वो झारणा वा जाली हूँ
मैं इश्क़ करणिया रांझा कोन्या, हां भैंसा का पाली हूँ।

के होड़ करैगा तू मेरी खुद अपणा प्यार तू खो आया
सीख “दीप” तै तू भी, कुछ जो मेरे दर्द नै टोह ल्याया
लिखदा चल सच्चाई “जांगड़ा” मैं भी तेरा रुखाली हूँ
मैं इश्क़ करणिया रांझा कोन्या, हां भैंसा का पाली हूँ

मैं इश्क़ करणिया रांझा कोन्या, हां भैंसा का पाली हूँ
मेरी हीर सै धरती मेरी रै मैं तो खेतां का हाली हूँ।

 

***** बचपन *****

वैं कागच की किश्ती अर पतंग आली डौर

वैं बलखाती होइ सांझ इठलाती होइ भौर

लुकण मच्याई के खेल वैं पुलिस अर चोर

स्कूल जांदी हाण मां की पारी याद आवै सै

वैं आच्छी भुंडी जीसी थी सारी याद आवै सैं

 

जोहड़ मैं कति डांगरा की ज्यूँ पड़े रहाँ थे

मास्टर खड़े भी कर दे था तो खड़े रहाँ थे

कदे बाग कदे ईंख कदे ब्याह मैं बड़े रहाँ थे

कान पकड़े पिंडियां की लचारी याद आवै सै

वैं आच्छी भुंडी जीसी थी सारी याद आवै सैं

 

बस्ते मैं तै कॉपी रह गी ना करणे के बहाने थे

गोलीबाज़ होया करते हम भी कुण्सा याणे थे

मास्टर नै भी चपरा देते इतणे तै हम स्याणे थे

झूले आली वैं आज भी अटारी याद आवै सै

वैं आच्छी भुंडी जीसी थी सारी याद आवै सैं

 

छुटियाँ मैं जाणा मामा कै चा सा होया करै था

घर नै रहणा पड़ जाता तै घा सा होया करै था

ब्याह वाणे सिंगरण का भी रा सा होया करै था

बेबे पर तै ले कै बरती होड़ उधारी याद आवै सै

वैं आच्छी भुंडी जीसी थी सारी याद आवै सैं

 

रपीयां की दिवाली पै गुल्लक फुटया करती

देह  ग्यास नै मांगण की ललक उठया करती

गैर टेम घर तै गए तै दादी घणा कुटया करती

घेर मैं बणाई होइ खेत की क्यारी याद आवै सै

वैं आच्छी भुंडी जीसी थी सारी याद आवै सैं

 

इब टेम कड़ै अर कित वैं दिन वापस आणे हैं

दो जून के टिकड़याँ ख़ातर येँ गात हंडाणे हैं

रपियाँ की दौड़ लागरी सैं बस नोट कमाणे हैं

दीप जांगड़ा बचपन की फुलवारी याद आवै सैं

वैं आच्छी भुंडी जीसी थी सारी याद आवै सैं

 

*****कैसे जण दूँ बेटी******

भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना

भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना
गीता भगवत इब झूठी पड़ गी झूठी हो गई नीयत दुष्ट की
झड़ गया ज्ञान का सच्चा मोती आत्मा चपेट मैं आगी कुष्ट की
समझया करते पैर की जुत्ती इब उस तै भी बदतर होगी
भाग बुलाया करते रै उसकी जिंदगी नरकस्तर होगी
मौत तै बड़ी कोई सज़ा नही थी या कार मौत नै छोटा करगी
क्यूँ तनै मै धरत पै ल्याया क्यों ना लाड़ो कौख मै मरगी
तेरा तिरस्कार ही आच्छा था लाड़ो तेरा जन्म पसंद रहया ना
भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना

मारण तै जनणा आच्छा लाग्या तनै इस धरती पै ले आई
इब हर नै कोसूं के घर नै के दुश्मन नै या कार कमाई
तेरे जन्म की खुशी मना कै बेटी कर दिया पाप मनै
इस दिन का बेरा होता तो लाड़ो मै मार देती आप तनै
तनै आपणा भाग बताया करता तेरे बाबू के सत्त हार लिये
फेर जन्म ना ओटीए लाड़ो
खुद नै कौख मै मार लिये
तेरी कोए रुखाली ना जग मैं तेरा कोई धर्म कोई गोत नही सै
तू मेरे पेट मैं मर ज्या ऐ तेरा न्यू मरणा कोई मौत नही सै
तेरे कातिल भेड़िये सुन्ने हांडै इस्तै बड़ा कोई मन्द रहया ना
भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना

बड़े लगैं थे नारे बेटी बचाओ ओर पढ़ाओ नै
किस मुँह बात करूं जामणकी किस कौख तै जणु बताओ नै
जो पहलां जाम्मी उसका तो के हाल हो लिया देखो ना
लेखांमै होगी तो फ़ेर जाम दयूं थम बैठ चिता पै सेको ना
मै कर्म की हिणी कोन्या थी मेरी लाड़ो कहती मरगी
मरणे का दुख ना होया इसी जिंदगी जीण तै डरगी
भाई मरगे माँ मरगी मरगया बाबू आज कति जीवते जी
दादा मरगया दादी भी कहै कदे नही जामियो धी
कद मिटै ये पापी लोग जगत तै के इन खातर कोई सन्द रहया ना
भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना

हाथ टूट गे कानून के जीवण पै तेरे दाग लाग गया
इस बहम मै ना जणीयो बेटी के लोग कहैंगे भाग जाग गया
बेशक घीटी दाब मार दयो मन तो समझाया जावैगा
ईसा दाग जिस बाप कै लागै क्यूकर जून हंडावैगा
इब ना रह रया रूप लक्ष्मी बेटी लोगों स्याणे होज्यो
ना रुकणे ये पाप किसे पै बेशक घर घर थाणे होज्यो
दीप तू लाड़ो माँगै था रै इब बता नै क्यों चुप होगया
वा भी तो तेरी बेटी थी जिसकै घर मै अंधेरा गुप होगया
मानूँ सूँ तेरी कलम सुधर गी तेरे शब्दां मैं गन्द रहया ना
भरोशा उठ लिया भग पर तै कोई राम नाम का छंद रहया ना
जेल भी टूटण लाग गई इब तो कोई नज़र मैं बंद रहया ना

Deep Jangra

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