Home Breaking आजादी के 70 साल बाद सपना होगा पूरा, गांव रोहनात में फहराया जाएगा तिरंगा

आजादी के 70 साल बाद सपना होगा पूरा, गांव रोहनात में फहराया जाएगा तिरंगा

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Indervesh Duhan, Yuva haryana
Bhiwani 23 March,2018

देश को आजाद हुए करीब 70 साल हो चुके हैं, लेकिन एक गांव ऐसा भी है जो खुद को आजाद नहीं मानता था। जहां पर न तो कभी गणतंत्र दिवस और न ही स्वतंत्र दिवस मनाया गया।

भिवानी के गांव रोहनात निवासियों के लिए आज का दिन खुशियों भरा है। जो मुराद सालों से पूरी नहीं हुई, वो अब पूरी होने वाली है।

मुख्यमंत्री मनोहरलाल आज इस गांव में आकर विकास कार्यो की घोषणा और शिलान्यास- लोकार्पण करेंगे।

ध्वजारोहण के रूप में आज गांव को सबसे बड़ी सौगात मिलेगी। आजादी के बाद गांव में पहली बार ध्वजारोहण किया जाएगा।

आखिर क्यों गांव वाले इतने मायूस है ?

दरअसल इस गांव ने क्रांति में हरियाणा की ओर से सर्वाधिक योगदान दिया मगर फिर भी आजादी के बाद जो हुआ, उसका दंश यहां के लोग आज भी झेलने पर मजबूर हैं।
गांव के वीर जांबाजों ने बहादुरशाह के आदेश पर 29 मई, 1857 के दिन अंग्रेजी हुकूमत में ईंट से ईंट बजा दी। इस दिन ग्रामीणों ने जेलें तोड़कर कैदियों को आजाद करवाया।

12 अंग्रेजी अफसरों को हिसार और 11 को हांसी में मार गिराया। इससे बौखलाकर अंग्रेजी सेना ने तोप लगाकर गांव के लोगों को बुरी तरह भून दिया। सैंकड़ों लोग जलकर मर गए, मगर फिर भी ग्रामीण लड़ते रहे।

अंग्रेजों ने इसके बाद भी अपने जुल्म- सितम जारी रखे। औरतों और बच्चों को कुएं में फैंक दिया। दर्जनों लोगों को सरे आम जोहड़ के पास पेड़ों पर फांसी के फंदे पर लटका दिया। ये कुएं और पेड़ आज भी अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों के जीते जागते सबूत हैं।

इस गांव के लोगों पर अंग्रेजों के अत्याचार की सबसे बड़ी गवाह हांसी की एक सड़क है। इस सड़क पर बुल्डोजर चलाकर गांव के अनेक क्रांतिकारियों को कुचला गया था। जिससे ये रक्त रंजित हो गई थी और इसका नाम लाल सड़क रखा गया था। इस वाक्य को याद करके गांव के लोगों की आंखें आज भी छलक उठती हैं।

दर्द ये है कि जिस गांव ने देश के लिए इतना कुछ किया उस गांव के लिए सरकारों ने कुछ भी तो नहीं किया।

ग्रामीणों के अनुसार देश की आजादी के आंदोलन में सबसे अधिक योगदान के बावजूद उनके साथ जो हुआ, उसकी कसक आज भी उनके दिल में है।

1857 में अंग्रेजों ने इस गांव को बागी घोषित कर दिया और पूरे गांव की नीलामी के आदेश भी दे दिए गए।

1858 में गांव की पूरी जमीन और मकानों तक को नीलाम कर दिया गया।

इस जमीन को पास के पांच गांवों के 61 लोगों ने महज 8 हजार रुपये की बोली में खरीदा। अंग्रेजी सरकार ने फिर फरमान भी जारी कर दिया कि भविष्य में इस जमीन को रोहनात के लोगों को ना बेचा जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि न तो उन्हें कोई मुआवजा मिला और न ही सरकार की तरफ से कोई दूसरी सहायता। गुलामी का बोझ आज भी वे ढ़ोने पर मजबूर हैं, क्योंकि उनका अपना कुछ नहीं है। मौजूदा सरकार के संज्ञान में मामला आने के बाद मामले में सीएम ने आवश्यक कार्यवाही की है, जिससे वे सभी ग्रामीण खुश हैं।

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