क्यूं जरूरी है हर किसान के लिए स्वामीनाथन रिपोर्ट का लागू होना

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Gourav Sagwal, Yuva Haryana

Chandigarh

किसान हमेशा राजनीति का केंद्र रहा है. ऐसी शायद ही कोई सरकार रही हो जो किसान को लेकर संजीदा हो या उनकी समस्याओं पर ग़ौर किया हो.

देश में खेती कितनी महंगी है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा ले की हर दिन कोई न कोई किसान आत्महत्या कर लेता है(आजकल तो इनकी  ख़बरें छपना बंद हो गई)

NCRB(नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) की एक रिपोर्ट ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले है. रिपोर्ट के हिसाब से साल 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की है.

यह आंकड़ा 2014 की तुलना में 2015 में दो फीसदी की बढ़ा है.वहीं साल 2014 में कुल 12360 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी. चौंकते तब है जब 12,602 लोगों में 8,007 किसान है और 4,595 खेती से जुड़े मजदूर.

साल 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 5,650 और खेती से जुड़े मजदूरों की संख्या 6,710 थी. इन आंकड़ों के अनुसार किसानों की आत्महत्या तो एक साल में 42 फिसदी बढ़ी है वहीं राहत की बात ये भी है कि कृषि मजदूरों की आत्महत्या की दर में 31.5 फीसदी की कमी आई है.

किसानों की मौत के आंकड़े

राज्यों में अगर किसानों की मौत के आंकड़ो की बात की जाए तो किसानों के आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र के हालात सबसे ज्यादा खराब है। इस राज्य में साल 2015 में 4291 किसानों ने आत्महत्या की थी. वहीं महाराष्ट्र के बाद किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक मामले कर्नाटक 1569 किसान, तेलंगाना 1400 किसान, जबकि तेंलगाना ने तो हजारो करोड़ो रूपये अपनी वर्षगांठ पर लगा दिए, मध्य प्रदेश में 1290, छत्तीसगढ़ में 954, आंध्र प्रदेश 916 और तमिलनाडु 606 किसानों आत्महत्या वाले प्रदेश है.

वहीं 1 जून से 10 जून तक किसानों का आंदोलन है. यह आंदोलन के केंद्र बिंदु की बात की जाए तो मध्य प्रदेश का मंदसौर रहा है जहां पुलिस की गोलियां किसानों ने सामने से खाई है. इस आंदोलन का भी केंद्र मंदसौर ही माना जाए जो देश के 7 राज्यों में असर दिखा रहा है. हरियाणा, पंजाब इस में मुख्य केंद्र है.

 

स्वामीनाथन रिपोर्ट क्या है?

कहते है कि अगर यह रिपोर्ट लागू हो जाती है तो देश के किसानों की दशा औऱ दिशा बदल जाएगी. किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने के लिए 2004 में केंद्र सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स बनाया. उस समय इस आयोग ने अपनी पांच रिपोर्टें सरकार को सौंपी थी। पांचवी रिपोर्ट ‘तेज व ज्यादा समग्र आर्थिक विकास’ के 11वीं पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य को लेकर बनी है।

आयोग की सिफारिशों में किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने हेतू, सेहत सुविधाएं बढ़ाने व वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है.

वहीं MSP की औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश भी की गई है ताकि छोटे किसानों को भी फायदा मिलें औऱ वे मुकाबले में आए.

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में किसानों को केंद्रित करते हुए यह भी कहा था कि इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि सस्ती दरों पर क्रॉप लोन मिले. यानि ब्याज़ दर सीधे 4 प्रतिशत कम कर दी जाए। कर्ज उगाही में नरमी (जब तक किसान कर्ज़ चुकाने की स्थिति में न आ जाए तब तक उससे कर्ज़ न बसूला जाए) साथ ही उन्हें प्राकृतिक आपदाओं में बचाने के लिए कृषि राहत फंड बनाया जाए.

बता दें कि किसान औऱ सरकार इस रिपोर्ट को लेकर आमने-सामने हमेशा से रही है. हर सरकार का चुनावी वादा किसान औऱ रिपोर्ट लागू करना रहा है. बहरहाल देखना दिलचस्प होगा की अबकी बार का ये आंदोलन कितना सफल होता है.

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